Take a fresh look at your lifestyle.

जब आपकी आस्था डगमगा जाती है,तो वंहा पर धर्म की विरादना ही होती है – मुनि श्री सौम्यसागर जी महाराज

0

अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

विदिशा – किसी कार्य को संपन्न करते समय अनूकूलता की प्रतीक्षा करना सही पुरूषार्थ नहीं है, कारण कि जो कुछ भी घट रहा है,वह राग की भूमिका में ही घट रहा है,और इससे आपके कार्य करने की गति में शिथिलता आती है,और इसी भांती प्रतीकूलता का प्रतिकार करना भी प्रकारांतर से द्वैष को आहूत करना है,और इससे मति में कलिलता आती है। “मूक माटी” महाकाव्य में आचार्य गुरुदेव अनूकूलता औरप्रतीकूलता की स्थिति का वर्णन करते हुये कहते है कि जब आपकी आस्था डगमगा जाती है,तो वंहा पर धर्म की विरादना ही होती है। उपरोक्त उदगार मुनि श्री सौम्यसागर जी महाराज ने शीतलधाम विदिशा में प्रातःकालीन प्रवचन सभा में कहे। उन्होंनै कहा कि वैरागी कभी अनूकूलता या प्रतिकूलता की प्रतीक्षा नहीं करता अनूकूलता की प्रतिक्षा करने का अर्थ है कि जिस शरीर को आपने आत्मा से अलग माना था उस शरीर से राग का परिचय करा रहे है। मुनि श्री ने कहा कि अभ्यास के अभाव में प्रतीकूलता आने पर आपका मन डंवाडोल हो सकता है,इसलिये आस्था की परिक्षा तो होंना ही चाहिये।उदाहरण देते हुये कहा कि संघ का विहार चल रहा था गैरतगंज पहुंचे रास्ते में तीन चार मुनिराजों का अंतराय हो गया उसमें में भी शामिल था आचार्य गुरूदेव ने हम लोगों को प्रोढ मुनि श्री पूज्य सागर जी के साथ गैरतगंज में ही रोक दिया, और संघ सिलवानी की ओर आगे बड़ गया। अनूकूलता की प्रतीक्षा के चक्कर में कभी किसी महाराज को अंतराय तो कभी किसी महाराज को फीवर ऐसा करते करते चार पांच दिन निकल गये और संघ आगे बड़ता चला गया और धीरे धीरे आचार्य श्री रामटेक पहुंच गये और हम लोग सागर में ही वने रहे। मुनि श्री ने कहा कि एक दिन का अंतराय और अनूकूलता की प्रतीक्षा में हम सभी महाराजों को सागर में ही साड़े पांच माह निकालना पड़े और चातुर्मास निकल गया। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री ने मूकमाटी में लिखा है कि ” कभी कभी गति या प्रगति के अभाव में आशा के पद ठंडे पड़ते है,घृति,साहस और उत्साह भी आह भरते है, मन खिन्न होता है।किन्तु यह सब आस्थावान पुरुष को अभिषाप नहीं है,वरन वरदान ही सिद्ध होते है,जो यमी दमी हरदम उद्यमी है! मुनि श्री ने उदाहरण देते हुये कहा कि चातुर्मास के दौरान एक वृद्धा मां प्रवचन सुनने आती थी एवं शुरुआत से लेकर जिनवाणी स्तुति तक वह पूर्ण समय रहती थी।एक दिन कोई जिज्ञासा के साथ अपनी वहू के साथ आई और अपनी जिज्ञासा को रखा तब कंही हम लोगों को जानकारी लगी कि उनको सुनाई नहीं देत है। मुनि श्री ने कहा कि इसको कहते है श्रद्धा और आस्था जिनको कुछ सुनने में नहीं आता था वृद्धावस्था है फिर भी वह पूरे चार माह तक सवसे आगे आकर वैठती थी कि मुनिराज के मुख से जिनवाणी और आगम की बात सुन रहे है, उन्होंने कहा कि अभी तक तो अनूकूलता की स्थिति थी लेकिन अब धीरे धीरे ठंडी की ओर मौसम बड़ रहा है।यही तो आप लोगों की परिक्षा की घड़ी है, ठंडी के मौसम की जो परवाह नहीं करता है वही अपनी आस्था को मजवूत रख सकता है, जो आस्थावान है वह अनूकूलता की प्रतीक्षा नहीं करता उसकी आस्था वरदान ही सावित होती है, संघर्षमय जीवन का उपसंहार नियम रूप से हर्षमय ही होता है, उन्हीं का जीवन हीरा वन पाता है जो संत आज्ञा का पालन करते है। जैसे पूत का लक्षण पिता की आज्ञा पालन करने में दिख जाता है, उसी प्रकार धर्म के प्रति श्रद्धा एवं आस्था प्रतिकूल परिस्थितियों में नियमों का पालन करने में ही दिख जाती है। उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि जैसे बड़ी रस्सी की गांठ आसानी से खुल जाती है,जबकि धागे की गांठ आसानी से नहीं खुलती उसी प्रकार बड़ी समस्याओं का तो निदान होता चला जाता है,लेकिन जिसे आप वहूत छोटी समस्या मानकर छोडते चले आ रहे हो और वही समस्या जटिल वन जाती है। उपरोक्त जानकारी श्री सकल दि. जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने देते हुये वताया मुनिसंघ शीतलधाम में विराजमान है एवं मूकमाटी महाकाव्य की प्रतिदिन वांचना 8:30 से चल रही है। विगत दिनों विदिशा नगर के बाल ब्र. श्री दिलीप भैयाजी के देह परिवर्तन पर मुनि श्री सौम्यसागर जी महाराज एवं मुनिश्री विनम्रसागर सागर जी महाराज सहित मुनिसंघ ने श्रदांजलि दी एवं सभा के अंत में नौ वार णमोकार महामंत्र का पाठन किया। इधर श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर विदिशा में परिवार जनों को देवदर्शन कराकर समाज के द्वारा श्रद्धांजलि सभा का आयोजन कर  आदरणीय दिलीप भैयाजी को याद किया गया।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन विदिशा,मध्यप्रदेश
संपर्क – 7828782835/8989696947

Leave A Reply

Your email address will not be published.