जैन गुरु

जब थोड़े में आ रहा है आनंद, तो ज्यादा की क्यों है लालसा : राष्ट्रसंत दिव्यानंद जी


रामांमंडी ,बंठिडा( पंजाब )। राष्ट्र संत,  समन्वय मिशन के प्रेरक, डॉक्टर, जैनाचार्य श्री दिव्यानंद सूरीश्वर जी महाराज साहब निराले बाबा जी ने समाचार पत्र के द्वारा भक्त जनों को प्रेरणा देते हुए कहा कि काफी गुरु भक्तों से जब मोबाइल पर बात होती है तो मैं पूछता कि लाकडाऊन में जीवन जीने का कैसा लग रहा है तो गुरु भक्त बताते हैं कि ऐसा लग रहा है कि कलयुग में सतयुग आ गया है। कितना सादा जीवन हो गया। दाल रोटी ,कुछ कपड़े ,एक घर बस इतना ही काफी लग रहा है।थोड़े में भी आनंद आ रहा है।

सुबह दुर्गा पूजा ,  माँ पद्मावती देवी की पूजा, नवकार महामन्त्र का जाप, भक्तामर पाठ का परायण,   फिर रामायण ,महाभारत ,फिर सन्त वाणी  , वाणी का भाव लिखना ,शाम को हवन ,आरती फिर महाभारत ,रामायण। सारे घर के सदस्यों का यही रूटीन हो गया है।सब मिल कर काम करते हैं। भागदौड़ की जिंदगी में ठहराव आ गया है। शांति , संतोष सबके मन मे है। सोना , चांदी, धन ,सुंदर ड्रेस कोई काम नहीं आ रहा। थोड़े में गुजारा हो रहा है । यही तो है संतोष धन। सब कुछ था ,बस यही तो नही था। भक्ति की लहर बहती रहती हैं। न कोई भाव बढ़ने की खुशी, न कोई घटने का दुख।न कोई पर चिंता, न कोई पर निंदा, सिर्फ और सिर्फ परमार्थ का भाव। लाकडाऊन से पहले  मुनष्य पागल सा हो गया था। अब  तो जीवन पाने को लग रहा है। मतलब जीवन है,तो जग है, अन्यथा….कुछ भी नहीं ।

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