जैन गुरु

जो बोया है वहीं उगेगा,और वही काटना है : मुनि सम्बोध कुमार

भगवान ऋर्षभ  देव …आदि तीथ॔ंकर…आदिश्वर ..ने वर्षीतप किया नही था,बस हो गया था…हा हो गया था,सब कुछ लौटता है जिन्दगी में …बूमरेंग की मानींद…अच्छा- बुरा..खट्टा-मीठा,कड़वा-कसैला…फिर वो भगवान हो या भगवान का अनन्य अनुयायी। कार्मिक थ्योरी है….जो बोया हैं वही उगेगा और वही काटना है।घुम रहे है भगवान ऋषभ …गली-गली-कुचे-कुचे-चोहट्टे-चोबारे..घर-घर,दर-दर …महाराज देहरी पर है…नाभी कुलकर के अंश …शिखर पुरूष ..ऋषभ सबने सब कुछ नजराना किया…नायाब हीरे-बेशकिमती मोती…दुर्लभ जवाहरात…मगर ऋषभ तो कभी का इन सब चीजों को ठूकरा आये थे। सबकी होंठो पर उतरी गुलाबी मुस्कराहट हवा होने लगी…ऋषभ ..रीते हाथों विदा हो रहे है-क्या चाहना है इनकी  सवाल आंगन- आंगन से उठे…मगर जवाब थे कि लौटकर आये ही नहीं।एक भूल थी…एक गलती थी…और गलतीयां माफ कहां होती है? तय है कि मिस्टेक हुई है तो सजा भी मिलेगी। सबकी सजा है…हर एक  गलती की…हर उस कदम की जो सही नहीं हैं,वो मॉल्स में,मल्टीप्लेक्स थियेटर में,दफ्तरों में …लिखा होता है ना सावधान आप सी सी टीवी कैमरा की नजर में है। हो सकता है कैमरा में कोई टेक्निकल मिस्टेक हो जाये मगर कम॔ का कैमरा 24×7 ऑन डयूटी रहता हैं …ना कभी लोक डाउन…ना कोई वायरस अटैक, और ना ही बंद होता है।

एक एक पल का एक्साइज अदा करना होता है। एक एक सैकंड का डेबिट चुकाना है, यहां हम क्या है? कौन है, हमारा स्टेटस क्या है-कोई मायने नहीं रखता,कोई फक॔ नहीं पड़ता,इस प्रोसेस से तो गुजरना ही होगा यहाँ सभी को।प्रारब्ध है ये…सब लौटकर आयेगा…भगवान ऋषभ के घर घर यायावरी की तह तक कोई अपनी पहुंच बना ही नहीं पाया।जरूरत थी रोटी की और मान- मनोव्वल हो रहे है सोना- चांदी-हीरे जेवरात की..राजा को तो यहीं भेंट करते है ना, कौन सोचेगा कि राजा भी आम इंसानों की तरह है- उसे भी आम लोगों की तरह भूख और प्यास भी लगती हैं। वनिता की आम अवाम सभ्यता के नये अध्याय लिखने लगी थी, मगर समय की परख अभी भी हाशिये पर थी, उनके विवेक ने, उनकी समझदारीयों ने अब तक अपने पंख इतने नहीं खोले थे कि उड़ान भर सके। मन बोझिल हुए जा रहा था कि प्रभू कुछ लेते क्यूं नहीं …हमसे ऐसी क्या भूल हो गई कि आंगन पर आकर प्रभु बिना भेंट लिये ही लौट जाते हैं।आंखे नम हो गई, नयन कोरो से सावन भादौ बरसने लगे, सवाल अब भी आसमान में उड़ रहे थे,एक अपराध बोध मन को रह रह कर साल रहा था…बारह महिने..रीत गये थे…ना एक दाना ..ना पानी की एक बूँद हलक में उतरी थी..भगवान …और भगवान के साथ ये सब हो रहा था ..वो एक अनजाने में हुइ भुल थी ..जिसका खामियाजा भुगत रहे थे प्रभु ऋषभ।गायें फसलें चट करने  लगी थी..किसानों की सारी मेहनत पर जैसे राहू कुंडली मारकर बैठ गया हो,आग उगलता सवाल यह था कि सारी फसलें गायें खाने लगी है…अब हम क्या खायेंगे।शिकायत पर समाधान का शामियाना  बिछाना था…और रास्ता था सिर्फ- महाराज ऋषभ,ऋषभ उनकी शिकायत पर मुस्कराये-गायें फसलों को इसलिए चट कर रही है कि उनके मुंह खुले हैं,मुंह पर छींकी लगा दो- और समस्या का अंत हो जाएगा।  उन्हें ऋषभ पर यकीन था।छींकी बंध गइ…बारह घण्टे हो चले..पिघल गये …गायें भुख से तड़पने लगी,चारा डाल भी दिया तो क्या हुआ …पेट की परवरिश नहीं हो पा रही है ,एक समाधान ने दुसरी मुसीबत के दरवाजे खोल दिये…क्या करें- क्या ना करे…कहाँ जाये..ऋषभ के सामने सवालों के बंवडर कुलाचे भरने लगे,ऋषभ ने सवाल पर अपना एक सवाल रख दिया-“क्या आपने “छींकी”खोल दी?सब एक दुसरे को देखने लगे।जवाब एक साथ “नही” में मिला…ऋषभ को अपनी भुल का अहसास हुआ,’छींकी’ खोले बिना कैसे खाएगी गायें,मैंने छींकी बांधने को कहां था,खोलने का निर्देश तो उन्हें दिया ही नहीं …बारह घंटे …गायों के मुंह पर “छींकी” का बंधन रहा…और बारह महिने तक न आहार मिला न पानी …कर्म  लौटकर आ गये थे…भगवान थे ना वो तो अपनी शक्तियों को,अपने अतिशयों को भुनाना कौन सा किसी तारा तोड़ने जैसे मुश्किल था…मगर ये कर्म है…किसी के साथ  पक्षपात नहीं होता…समय ने कार्मिक एकाउंट के  बैलेंस की घोषणा की..और श्रेंयास कुमार के हाथों भगवान ने इक्षुरस से वर्षीतप की इतिश्री की।और अक्षय तृतिय वर्षीतप ने महोत्सव का रंग ओढ लिया।करे…अपना उत्साह …अपने प्रेम …अपनी दरियादिली अर्पित करें, अक्षय तृतीया पव॔ को…बस मन को समझाकर रखे कि मुझसे कभी कुछ ऐसा ना हो जो किसी के नैंनो से आंसुओ को पिघलकर बहने का रास्ता खोल दे,जो किसी के मखमली मन पर गहरे लाइलाज जख्म बना दे।जो किसी के दिल पर ऐसी चोट लगाये कि उस दद॔ की दवा कोना-कोना छान लेने के बाद भी आंखो को ना मिले।सादगी को अपना श्रृंगार बनाने की जिद्द करके देखे…जिन्दगी का हर दिन एक महोत्सव होगा।*जिन्दगी है इक कोरा कागज,रच दो इस पर ऐसी निशानी*,*हर पन्ना बन जाये जो,अंतहिन अमिट कहानी।

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