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हमें नेता नहीं श्रावक कार्यकर्ता चाहिए : आचार्य महाश्रमण


 पर्युषण के तीसरे दिन मनाया गया सामायिक दिवस


AHINSA KRANTI / ब्यूरो चीफ राजेन्द्र बोथरा


हैदराबाद। तीर्थंकर के प्रतिनिधि, भैक्षव शासन के 11 वे पट्टधर,परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी ने परम आराध्य परम वंदनीय भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा के संदर्भ में गातांक से आगे वर्णन करते हुए कहा कि सेवा एक बड़ा गहन धर्म है जो योगियों के लिए भी अगम्य है। ध्यान, ज्ञान भी अच्छा है पर उससे भी अच्छा है निस्वार्थ भाव से शारीरिक व मानसिक सेवा करना,शरीर व मन दोनों को समाधि देना। सेवा करने वाले में अच्छी भावना व निष्ठा होनी चाहिए, सेवा बहुत बड़ा धर्म है। हमारे धर्म संघ में यह व्यवस्था बड़े सुंदर ढंग से चल रही है, हमारे संघ में 3 साल तो साधु, साध्वियों को चाकरी सेवा करना होता ही है उसके बाद भी मौका मिलता है तो बड़ी निष्ठा से सेवा करते है। जिस संघ में सेवा भावना नहीं होती वहां कोई नहीं जाना चाहता, संघ में सेवा की भावना पुष्ट रहे। भगवान महावीर के जीव मरीचि को शिष्य बनाने की भावना तो हुई पर जो भी उसके पास आता ऋषभ के पास भेज देता, वह जानता था कि सही मार्ग उनका ही है।

पर कपिल ब्राह्मण मरीचि का ही शिष्य बना। मरीचि का जीवन समाप्त हो गया और वह अपनी साधना के प्रभाव से चौथे भाव में पांचवें देवलोक में उत्पन्न हुआ। देवता का जीवन काल लंबा हो सकता है परन्तु न मरने की दृष्टि से अमर नहीं होता। फिर पांचवें भव में भगवान महावीर का जीव  ब्राह्मण कौशिक व छट्टे भव में ब्राह्मण पुष्यमित्र नामक परिव्राजक बना। पुण्य का बंध होने से वह सातवें भव में सौधर्म देव बनता है व आठवें भव में फिर परिव्राजक बनता है। नौवें भव में दूसरे देवलोक में, दशवें भव में फिर ब्राह्मण परिव्राजक। ११ वें में फिर देव व १२ वें में फिर ब्राह्मण और परिव्राजक। महावीर का जीव ब्राह्मण जाति में बार बार जन्म लेता रहा। हम कुछ अगले जन्म के बारे में भी सोचें, जीवन की घड़ी चल रही है, हमने मोक्ष की प्राप्ति के लिए क्या किया ? यदि भावना शुद्ध रहे व ईमानदारी रहे तो उसमें तो समय नहीं लगाना पड़ता। निर्जरा का ज्यादा लाभ ना भी मिले तो पाप कर्मों से तो बचना चाहिए।

१३वें में देव व १४वें में  परिव्राजक , १४वें भव के बाद १५वें में फिर देवलोक व १६वें में साधु बनकर भी एक निदान कर लिया | निदान करना साधना व तपस्या को बेच देना होता है | सब कुछ करने के बाद भी व वैसा ही नादान होता है जैसा एक करोड़ रुपए देकर एक रूपये की कांकिणी खरीदने वाला, चिंतामणि रत्न से कौवे को उड़ाने वाला होता है | १७वें भव में देवलोक व १८वें भव में पोतनपुर के राजा प्रजापति व रानियाँ मृगावती तथा भद्रा के घर राजकुमार त्रिपटिक के रूप में पैदा हुए। 
पूज्य प्रवर ने आगे प्रेरणा देते हुए कहा –  नव दीक्षित साधु साध्वियों को अग्रज अच्छी शिक्षा देवें व ऐसा योग्य बना देवे की वह भी अग्रणी बनने योग्य हो जाए। बेटा पिता से भी आगे निकल जाए तो यह पिता के लिए बड़ी प्रसन्नता की बात होती है। हमारे कार्यकर्ता भी गुणवत्ता सम्पन्न हों । संस्थाओं के अध्यक्ष बनने से पहले खुद के अध्यक्ष बनें। कार्यकर्ता केवल नेता नहीं श्रावक कार्यकर्ता बनें व उनमें धार्मिकता व व्यसन मुक्ति भी रहे, यह जरूरी है।ज्ञानशाला के माध्यम से बच्चों में अच्छे संस्कार भरे जा सकते हैं।*पर्युषण का तृतीय दिवस : सामायिक दिवस*  आचार्य प्रवर ने फरमाया कि आज पर्युषण पर्व का तीसरा दिवस सामायिक दिवस है। स्वरचित गीत के माध्यम से गुरुदेव ने बताया कि सुश्रावकों को सामायिक करके धर्म कमाई करनी चाहिए। सामायिक से कर्म निर्जरा होती है। यह 48 मिनट की साधना है , सद्भावों की निष्पादना है। उन साधुजनों को वंदन है, उनका सविनय अभिनंदन हैं जो जीवन भर सामायिक  पालते है। सामायिक में खाली नहीं बैठकर  हम जप स्वाध्याय ध्यान व आगम चर्चा करें तो और अधिक लाभ हो सकता है। सामायिक व्रत संवर है, शुभ योग है। ग्रहस्थ लोग समता भाव रखें व राग द्वेष से विमुक्त होकर सप्ताह में कम से कम एक सामायिक जरूर  करे क्योंकि सामायिक में हम सब का कल्याण निहित है।
इससे पूर्व मुख्य मुनि महावीर कुमार जी ने तीर्थंकरों के जीवन चरित्र के बारे में अपने विचार प्रस्तुत किए व साध्वीवर्या संबुद्घ यशाजी ने आर्जव- मार्दव विषय पर अपने भाव गीतिका  के माध्यम से प्रस्तुत किए।

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