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वैभव का महत्व नही है, महत्व है त्याग का-मुनि श्री समता सागर जी महाराज

मध्यप्रदेश अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

विदिशा(भद्दलपुर)- “पुण्य के योग से धन का अर्जन होता है, वह धन यदि अच्छे कार्योँ में लग जाऐ तो वह पुण्य का योग माना जाता है, धन है तो वह तुम्हारे पास रूकने वाला तो है नही,  कृपण और लोभिओं का धन या तो सफेद डिरेस में अर्थात अस्पताल और डाक्टर में जाएगा या फिर, दूसरी डिरेस  काली डिरेस यह डिरेस है

कोर्ट कचहरी और  वकील की होती है, और तीसरी डिरेस है खाकी डिरेस यदि एक वार आपका द्रव्य इसमें चला गया तो वंहा से वचना वहूत मुश्किल है” यदि तीनों ड़ेसों के चक्कर से वचना है तो विना डिरेस वालों के पीछे लग जाओ उपरोक्त उदगार मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर में व्क्त किये।

उन्होंने अपने भक्तोंं के लिये प्राथना करते हुये कहा “में भगवान से प्राथना करता हूं इन धर्मात्माओं का द्रव्य इन तीन डिरेस वालों में कभी न लगे, इन तीन डिरेस वालों से उनको हमेशा वचाना” उपरोक्त उदगार मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने प्रातःकालीन प्रवचन सभा में श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर में व्यक्त किये।

उन्होंने कहा कि “वैभव का महत्व नही है, महत्व है त्याग का” उन्होंने वनारस के स्यादवाद महाविद्यालय की संयोजना की  त्याग का उदाहरण देते हुये कहा कि गणेश प्रसाद वर्णी जी जो कि एक ब्र.थे उन्होंने मात्र एक पोस्टकार्ड पर उसकी संयोजना रखी और विशाल विश्वविद्यालय खड़ा कर दिया। हालांकि में मानता हूं, कि किसी भी संयोजना में समय लगता है लेकिन उस समय के उपरांत जो नवनीत निकलता है, वह महत्व पूर्ण माना जाता है, जो समाज को आगे वड़ाता है।

 मुनि श्री ने सम्वोधित करते हुये कहा कि संकल्प शक्ती जिसके पास होती है, वह अपने आत्मवल से वड़े से वड़ा कार्य चुटकियों में  कर लेता है, और विदिशा वाले तो अपने द्रव्य का सदुपयोग करना जानते है, वड़े से वड़ा कार्य की संयोजना को कर चुके है। जंहा पर पूज्य गुरूदेव का समवसरण लग चुका हो वंहा पर हमें कुछ भी कहने की आवश्यकता नही है। 

उन्होंने कहा कि हमारे ऊपर तो आचार्य गुरूदेव की ऐसी कृपा रही है कि कर्नाटक हो या महाराष्ट्र , गुजरात हो या राजस्थान हम जिधर जिधर भी गये भले ही हमें कन्नड़ नहीं आती थी लेकिन गुरूदेव का ऐसा आशीर्वाद रहा कि वंहा पर हिन्दी का प्रवचन ही लोगों को भा गया। उन्होंने कहा कि हमनेहमेशा समाज को  एक करने का ही प्रयास किया है, और इसमें हमें सफलता ही मिली।

उन्होंने कहा कि  गुरु के त्याग और संयम का प्रभाव पड़ता है।उन्होने कहा कि कोई भी द्रव्य का अर्जन विना आरंभ और परिग्रह के नहीं होता। पुण्य के योग से ही धन का अर्जन होता है, मुनि श्री ने सामाजिक संरचना की वात करते हुये कहा कि आज समाज में सभी सक्षम नहीं है, और उनके परिवार को वेटियां को प्रतिभास्थली के माध्यम से उच्च शिक्षा, आदि आदि  अच्छे कार्य में, जंहा द्रव्य का सृजन अधिक हो गया हें ,

उस द्रव्य की जंहा जरूरत है वंहा पर उनके द्रव्य का सदुपयोग करने की प्रेरणा हमने समाज को दी है, और उसके अच्छे रिजल्ट भी आए है।उन्होंने कहा कि पैसा तो सभी के पास होता है, लेकिन उन पैसों का सदुपयोग कराने वाले गुरू होते है। उन्होंने कहा कि धन की तीन ही गति होती है यदि तुम्हारा द्रव्य अच्छे कार्यों में नहीं लगा तो वह गलत स्थान पर लग जाएगा। या फिर नष्ट हो जाएगा।

इस अवसर पर ऐलक श्री निश्चयसागर जी महाराज मंचासीन रहे एवं क्षु. श्री ध्यान भूषण जी ने  भगवान शीतलनाथ स्वामी के चार कल्याणक भूमी  के संद्रभ में भगवान का संपूर्ण इतिहास एवं जीवन परिचय सहित काव्य रचना सुनाई।

प्रवक्ता अविनाश जैन ने वताया 4 जुलाई शनिवार को मुनिसंघ के प्रवचन 7:45 से आचार्य श्री की पूजन तत्पश्चात प्रवचन एवं 8:30 वजे स्टेशन जैन मंदिर माधवगंज से शीतलधाम की ओर प्रस्थान करेंगे। जंहा पर विश्व शांति हेतू 9 वजे से अतिशय युक्त प्राचीन प्रतिमा भगवान श्री आदिनाथ स्वामी वर्रो वाले वावा का महा मस्तकाभिषेक एवं शांतिधारा मुनिसंघ के सानिध्य में संपन्न होगी।  मुनिसंघ शनिवार एवं रविवार को शीतलधाम पर ही विराजमान रहेंगे। एवं मांगलिक प्रवचन एवं आहार चर्या वंहीं से संपन्न होगी।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन (विदिशा) मध्यप्रदेश

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