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आचार के प्रतिपक्षी तत्वों से बचने का प्रयास करें : आचार्य महाश्रमण जी

अहिंसा क्रांति / राजेन्द्र बोथरा


हैदराबाद। ठाण‌ं आगम ने कहा गया है साधु का जो आचार है उसके छह प्रतिपक्षी तत्व बताएं गए है। पहला पलिमन्थु, प्रतिपक्षी तत्व है चपलता, चपलता करने वाला साधु संयम का प्रतिपक्षी बन जाता है यानी यह जो चपलता है वह बाधक है साधना में, संयम की साधना में तो चपलता का निरोध होना चाहिए, संयम और चपलता दोनों में विरोध भाव है। चपलता तीन प्रकार की हो सकती है, स्थान से  शरीर से और भाषा से। पहली स्थान से चपलता यानी अपने स्थान से अनावश्यक उठ- उठ कर जाना, स्थान संबंधी चपलता हो जाती है। दूसरी शारीरिक चपलता, शरीर को स्थिर न रखना, यह शारीरिक चपलता ही संयम की साधना में बाधा है। तीसरी भाषायी चपलता, थोड़ी सी अगंभीरता की स्थिति, बैठे-बैठे सीटी बजाना, किसी के बोलने की नकल करना, हंसी उड़ाना, यह भाषा की चपलता है, यह संयम का पलिमन्थु है चपलता। 

दूसरा पलिमन्थु शास्त्र में बताया गया है वाचाल,  वाचाल सत्य वचन का पलिमन्थु हैं, वाचालता सच्चाई की ऊंची साधना करने में बाधा है, सच्चाई साधु का धर्म है उसके लिए एक रक्षा कवच है कम बोलना। सच्चाई की ऊंची साधना में एक रक्षा कवच मौन, कम बोलना, मितभाषिता है। तीसरा पलिमन्थु बताया गया है चक्षुलोलुप, चक्षुलोलुप साधु है, दृष्टि आसक्त है वह इर्यापथिक का पलिमन्थु है, साधु का धर्म है इर्यासमिति का पालन करना, देख देख कर चलना, कोई जीव जंतु आदि पैर से मर ना जाए ,दृष्टि की  लोलुपता यानी चलते-चलते इधर-उधर देखना साधु के इर्यासमिति में बाधक है। चौथा पलिमन्थु है चिड़चिड़े स्वभाव वाला साधु भिक्षा की  एषणा का पलिमन्थु है।

जो साधु शांत स्वभाव का नहीं है भिक्षा के लिए गया, भिक्षा नहीं मिली छिन्न हो गया, साधु को समता रखनी चाहिए, आहार मिला तो ठीक ना मिला तो ठीक क्योंकि दोनों हाथों में लड्डू है, कैसे? मिला तो अच्छा है, ना मिला तो तपस्या है। साधु को गोचरी में आवेश नहीं करना चाहिए जो मिले उसे मिल बांट कर या रुग्ण व बाल साधु की पूर्ति पहले करके फिर जो बच्चे वह आपस में बांट लेना चाहिए। पांचवा पलिमन्थु है अतिलोभी, अतिलोभि मुक्ति मार्ग का पलिमन्थु है, बहुत ज्यादा लोभ का भाव है तो मुक्ति, संतोष के मार्ग में बाधा है। लोभ और संतोष दोनों में विरोध है।छठा पलिमन्थु है आसक्त भाव से किया जाने वाला पोद्गलिक सुखो  का संकल्प ,वह मोक्ष मार्ग में पलिमन्थु है ।

साधुपना पालते हुए यह मन में संकल्प आ जाए कि मेरे साधुपन का फल हो कि आगे के जन्म में मैं चक्रवती राजा बन जाऊं, बलवान आदमी बन जाऊं, मेरी तपस्या का यह फल मुझे मिल जाए । अरे भोला कहीं का, इतनी बड़ी साधना को थोड़े से लाभ के लिए खो रहे हो, चक्रवती बनने के लिए मोक्ष दिलाने वाले साधुपन की महत्ता खो रहे हो। तो निदान करना है वह मोक्ष मार्ग में पलिमन्थु है।  शास्त्रकार ने ठाणं में यह छह प्रकार के पलिमन्थु , प्रतिपक्षी बताए हैं, खास करके साधु समाज को तो इनमें जागरूक रहकर के इन पलिमन्थुओ से बचना ही चाहिए,आप लोग ग्रहस्थ भी जितना ध्यान दे सकें देने का प्रयास करें, यह आपके लिए भी कल्याण की बातें हैं।

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