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मन-वचन और काया तीनों से हिंसा का त्याग करना है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

 ब्यूरो चीफ – दलीचंद श्रीश्रीमाल
मैसूर । 3 अगस्त 2020 श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर तथा साध्वी भद्रिकाश्रीजी म. ने धर्म संदेश मे बताया कि – आज कल जगत में हिंसा व्यापकरूप में हो रही है । दिन-प्रतिदिन हिंसा में वृद्धि हो रही है । जहाँ-जहाँ हिंसा बढ़ रही है, वहाँ-वहाँ कुदरत अपना परचा भी बता रही है । अहिंसा से समा बांधने की जगह हिंसा से नाता बांधनेवाला अाखिरकार दुःखी ही होता है । धर्मरूपी पुत्र जन्म देने वाली माँ है अहिंसा यानी दया । वह माँ का ही गला घोंट दिया तो क्या होगा ? बच्चे की भी हालत क्या होगी ?
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जो मानव हमोशा आदर के साथ जीवों की रक्षा करता है, वह मानव के हाथ में लक्ष्मी रहती है और घर के आँगन में ही स्वर्ग होता है । स्वर्ग और लक्ष्मी मिलने पर क्या बाकी रहा ? सब कुछ मिल गया, पा लिया । हिंसा करने वाला बार-बार नरक में जाता है । एक बार किसी की हिंसा की तो वह पाप के परिणाम में कम से कम 10 बार कुमौत आती है । जन्म भी कम आयुवाला और इन्द्रियाँ की क्षतिवाला प्राप्त होता है । रूप बेड़ौल मिलता है । महाभारत में लिखा है – रत्नों के साथ सात पृथ्वी का और सुवर्णमय मेरूपर्वत का दान दिया लेकिन जीवदया का पालन नहीं किया तो वह दान निरर्थक है । उपदेशप्रासाद नामक जैन ग्रंथ में तो वहाँ तक लिखा है – यदि आप मनसे हिंसा करने का सोचते हो तो भी नरक में जाना पड़ता है । इसी ही कारण मन-वचन और काया तीनों से हिंसा का त्याग करना है । योगशास्त्र में हेमचन्द्राचार्यजी फरमाते है – हिंसा करने वाला इन्द्रियों का दमन करे, देव-गुरु की कितनी भी सेवा करें, करोड़ों रूपये का दान करें, ज्ञान का कितना भी अध्ययन करलें और कितना भी तप कर लें… सब निरर्थक है, निष्फल है ।
महाभारत के शांतिपर्व में कहा है – जीवों को अभयदान देने से सौभाग्य, आदेय यानी सर्वजन मान्य वचन, सौम्य-सुंदर आकृतिवाला, दानी-भोगी-कीर्ति के निधानरूप बनता है । लंबी आयुष्यवाला होता है । नीरोगी होता है । जो आत्मा अन्य जीवों को अभयदान देता है, उसको दूसरें जीवों से कभी भय नहीं रहता । बाकी सब दानों का फल क्षीण होता है लेकिन अभयदान का फल कभी नष्ट नहीं होता ।
जगत में सुवर्ण-गायों-पृथ्वी आदि का दान देने वालें सुलभ है, अभयदान देने वालें ही दुर्लभ है । अभयदान की क्रिया पैसे वालें ही कर सकें ऐसा नहीं है, बिना पैसेवालें भी यह दान दे सकता है । और ऐसे अभयदान देनेवालों में पूर्ण अहिंसा का पालन करने वालें साधु सर्वश्रेष्ठ गिने जाते है ।

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