विश्व में धर्म-दीपक से चढ़कर-बढ़कर कोई दीपक नहीं है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

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AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर। श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य विजय भव्यदर्शन सूरीश्वरजी म. ने धर्म संदेश में बताया कि – सुपुत्र होता है वो कुल में दीपक कहलाता है । रात्रि का दीपक आकाश में रहा चन्द्र है । प्रभात समय का दीपक सूर्य होता है । मतलब, एक कुल का दीपक है तो सूर्य-चंद्र आकाश के दीपक है । जब कि धर्म तो तीन लोक का दीपक है । आगे जाकर ऐसा भी कहा जायेगा कि दिया भी बूझता है । आकाश में सूर्य और चन्द्र का भी अस्तु होता है ।

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कुल दीपक की आयु खत्म होने पर उसकी भी गैर हाजरी होती है लेकिन धर्म एक ऐसा दीपक है, जिस की कभी भी गैरमौजूदगी नहीं होती ।सुर्य-चंद्र नाम के दीपक की बात करें तो वे दोनों दीपक अपने बस में नही है, क्योंकि उन दोनों पर हमारा हक्क-अधिकार नहीं है । कुल दीपक (सुपुत्र) पर तो हमारा अधिकार भी है । हमारे बस में बना सकते भी हैं । उसी तरह भगवान ने जताया हुआ धर्म करके हम त्रैलोक्यदीपक को भी हमारा जीवन-दीपक बनाकर प्रकाश प्राप्त कर सकते है । दिया अति सीमित क्षेत्र को ही प्रकाशित करता है । चन्द्र और सूर्य भी सीमित क्षेत्र में ही अपना प्रकाश डाल सकता है । कुल दीपक दो-चार देश में अपना यश-प्रकाश फैला सकता है, जबकि धर्म-दीपक तो तीनों भुवन को प्रकाश से भर सकता है । द्रव्य दीपक (दीया) का प्रकाश का कोई लाभ नहीं उठ़ा सकते । अर्थात्  दूसरों को वे प्रकाश देकर उपकार करते हैं । खुद को कोई फायदा नहीं होता । हाँ, धर्म-दीपक तो स्व-पर प्रकाशक है ।

उसी ही कारण सारे विश्व में धर्म-दीपक से चढ़कर-बढ़कर कोई दीपक नहीं है । वास्तविक दृष्टि से देखें तो वो ही पुत्र जगत में प्रख्यात है, सुपुत्र के रूप में है, जो कुल को पवित्र बनाता है, उस पुत्र के कारण माँ भी कृतार्थ बनती है । वसुन्धरा भी उससे ही भाग्यवती होती है । जो लड़का-पुत्र अभ्यन्तर मार्ग में श्रुत(ज्ञान) सिंधु में मग्न है और जिसका चित्त परब्रह्म में लगा हुआ है ।धन के कारण बननेवाली प्रख्याति दीर्घ काल तक नहीं टिकती । धन-लक्ष्मी-संपत्ति चंचल और चपल है । चढ़ानेवाली संपत्ति कब गिरा देगी वो पता तक नहीं चलेगा । लक्ष्मी किसी की कभी न हुई है, न होगी । मानवों में सबसे ज्यादा संपत्तिवान होता है चक्रवर्ती । वो चक्रवर्ती की भी आयु खत्म होने पर नरक में चला जाता है । चौदह रत्न-नौ निधि-हजारों देव होने पर भी कोई उसको बचा नहीं पाता । हाँ, जो चक्रवर्ती लक्ष्मी-सत्ता वगैरह को छोड़कर साधु बन जाता है, उसको मुक्ति या स्वर्ग की ही प्राप्ति होती है । मथितार्थ-सार तो यह निकला लक्ष्मी को पकड़नेवाले को लक्ष्मी डुबाती है, छोड़नेवाले को उबारती है । संग्रह करने वाले को डुबाती है, दान करनेवाले को बचाती है ।

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