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ज्ञान से आत्मा से आत्मा का अनुभव जरूर होता है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर। श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर तथा साध्वी भद्रिकाश्रीजी म. ने धर्म संदेश मे बताया कि – आस्तिक दर्शनवाले ही आत्मा को मानते है । आत्मा आंख से दिखने वाली चीज नहीं है । ज्ञान से आत्मा से आत्मा का अनुभव जरूर होता है । आगे जाकर केवलज्ञानी आत्मा को ज्ञान के माध्यम से प्रत्यक्ष देखते है । आत्मा को देखने के लिए अतीन्द्रियज्ञान की अपेक्षा रहती है । इन्द्रियों से स्थूलपदार्थों का भी पूरा ज्ञान जब नहीं होता है तो सूक्ष्म पदार्थों का ज्ञान कैसे होगा ?  इन्द्रियों की शक्ति में भी तरतमता रहती है ।

क्योंकि हरएक इन्द्रियों को शक्ति देनेवाला कर्म भिन्न भिन्न होता है । अपने अपने कर्म के अनुसार उन उन इन्द्रियों को शक्ति कम-ज्यादा मिलती है । मानव को सूंघने की शक्ति दस फिर की भी नहीं होती है, जब चींटी छोटी होने के बावजूद उस को आठ मील दूरी से बास आ जाती है । मतलब, उसका नाक ज्यादा तेज होता है । चील की आंखों में मानव से ज्यादा लंबी नज़र होती है । कई ऐसे जानवर है जिनको मानव से ज्यादा इन्द्रियों की शक्ति प्राप्त होती है । तब तो चोरी वगैरह पकड़ने के लिए इन्सान भी स्निफर डॉग का उपयोग करता है । बारूद वगैरह की गंध भी डॉग को जल्द आ जाती है । मानव को इस चीज का पता तक नहीं चलता ।सामान्य से कहे तो जानवरों से ज्यादा बुद्धिशक्ति इन्सानों में होती है… फिर भी कइ बार प्रत्यक्ष में ऐसा अनुभव नजर आता है, जिस में मानव से बेहतर बुद्धि जानवरों में दिखाई देती है । कभी कभी इन्सानों में भी देखें तो बड़ो से ज्यादा तेज दिमाग बच्चों का चलता हो – ऐसा स्पष्ट महसूस होता है । इसका समाधान देते हुए आचारांग सूत्र कहता है – ‘पुढो जीवा, पुढो कम्मा।’ 

मतलब, प्रत्येक जीव भिन्न है, उसी तरह प्रत्येक जीवों के कर्म भिन्न-भिन्न है । कर्म के अनुरूप जीवों को हीन-अधिक शक्ति प्राप्त होती है । कर्म कभी कभी इतने बलवान हो जाते है कि जीव को पछाड़ देता है । अतः आत्मा से कर्म ज्यादा बलवान न बन जाय उसका ध्यान रखना है । नंदीषेण मुनिवर को पावरफूल बनें कर्मो ने ही पछाड़ा था । आत्मा को इतना तेज-पावरफूल बना देना है कि – कर्मों को मात दे सकें । कर्मों को धोबी-पछाड़ देकर विजयी बन सके ।आत्मा को तेज बनाने के लिए शास्त्रों के मार्गदर्शनानुसार बुद्धि-दिमाग का इस्तेमाल होना चाहिए । कभी-कबार बुद्धि के ऊपर मोहराजा का आधिपत्य प्रस्थापित हो जाता है, कभी अज्ञानता के कारण बुद्धि विपरीत मार्ग पर भटक जाती है । ऐसे होने पर मालिक-आत्मा गुलाम जैसी बन जाती है । आत्मा अनाथ अवस्था के भागी बन जाती है । आत्मा की आजादी को कर्म मोह वगैरह छीन लेते है । कर्म और मोह ऐसे छल-कपट और मायाजाल में फंसाकर ठ़ग लेते है । इन सबसे आत्मा को बचाने मे आप कामियाब बने, यही मंगल कामना।

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