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भाव के छह प्रकार हैं : आचार्य श्री महाश्रमण जी 

AHINSA KRANTI NEWS / RAJENDRA BOTHRA
हैदराबाद। ठाणं आगम में कहा गया है भाव के छह प्रकार होते हैं -औदयिक,  औपशमिक, क्षायिक , क्षयोपशमिक पारिणामिक,सान्निपातिक । आत्मवाद और कर्मवाद यह दो महत्वपूर्ण सिद्धांत है और जैन दर्शन में सम्मत है। आत्मवाद आत्मा है उसका स्वतंत्र अस्तित्व है वह शाश्वत है और संसारी आत्मा वर्तमान में अशुद्ध है इसलिए वह जन्म मरण जन्म मरण के चक्र में गति कर रही है‌ आत्मा अशुद्ध क्यों है, अब यहां कर्मवाद की बात आती है कि आत्मा अभी कर्मों से आवृत हैं इसलिए आत्मा अशुद्ध है तो आत्मा और कर्म आपस में घुले मिले हुए हैं आत्मा और कर्म का संयोग है और कर्म कभी कम हो जाते हैं कभी ज्यादा हो सकते हैं कर्मों के प्रभाव से हमारी चेतना में परिवर्तन आता रहता है ।
शास्त्र कार ने बताया है कि भाव के छह प्रकार हैं, भाव क्या होता है ,कर्मों के उदय और विलय से और साथ में परीणमन से जो अवस्था होती है उसका नाम है भाव।भाव के साथ कर्मों का बड़ा गहरा संबंध है हमारे जीवन की सूक्ष्म और स्थूल व्याख्या कर्मवाद व भावों के आधार पर की जा सकती है ।भाव के छह प्रकारों में पहला भाव है औदयिक, जैन दर्शन में  आठ कर्म बताए गए है, इन आठ कर्मों के दो विभाग होते हैं एक घाती कर्म दूसरा अघाती कर्म। घाती कर्म, जो आत्म गुणों की घात करने वाले हैं और जिनको नष्ट करना भी कुछ मुश्किल है ,यह चार हैं,शेष चार अघाती करम है। आठ कर्मों के उदय से जो अवस्था बनती है वह औदयिक भाव है। दूसरा भाव है औपशमिक – शांति, शांत हो जाना। उपशम भाव आठ कर्मों में केवल मोहनिय कर्म का ही होता है और किसी कर्म का नहीं होता। तीसरा है क्षायिक भाव- कर्मों के छय से होने वाली अवस्था ।क्षायिक भाव आठों कर्मों का होता है एक बार क्षायिक भाव हो गया तो दोबारा कभी वह जाता नहीं है ।चौथा है क्षयोपशमिक भाव- क्षयोपशमिक भाव है वह न तो पूरा क्षय हुआ है और उदय भी है, तो देखिए जो कर्म उदय हो गए उनका तो क्षय,अनूदित का उपशम, यों दोनों मिलाकर के क्षयोपशम, सारांश में यूं समझें कर्मों का हल्कापन।
क्षयोपशम के रूप में जो स्थिति बनती है वह आठ में से चार घाती कर्मों की ही बनती है, ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय,  औ अंतराय। इन चार कर्मों का ही क्षयोपशम भाव होता है बाकी शेष का नहीं। ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम का उदाहरण है बहुत ज्ञानवान बालक होना। साधुपन कब आता है ,जब प्रत्याखानी  क्रोध, मान, माया ,लोभ का क्षयोपशम होता है तब साधुपन आ सकता है और श्रावकत्व कब आता है, अप्रत्याखानी क्रोध, मान, माया, लोभ का क्षयोपशम होने से श्रावकत्व आता है ।सम्यकत्व कब आता है, अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया ,लोभ का चाहे क्षयोपशम हो, चाहे उपशम हो, चाहे छय हो, तब सम्यकत्व आता है। अंतराय कर्म का भी क्षयोपशम होता है। पांचवा भाव है पारिणामिक- यह तो सब के साथ जुड़ा हुआ है, हर भाव के साथ यानी उदय के साथ भी उपशम के साथ भी। पारिणामिक है। और जीवत्व,भवत्व,अभवत्व यह सब पारिणामिक भाव है। छठा भाव है सान्निपातिक -दो से अधिक भावों का संयोग होने से जो स्थिति बनती है वह है सान्निपातिक भाव। हम मनुष्य हैं इस हमारे मनुष्यत्व में पांच इंद्रियां भी है, शरीर भी है, मनुष्यत्व है यह उदय भाव और क्षयोपशम भाव दोनों का योग है। तो यों कुल छह भाव होते हैं, पांच भाव तो प्रसिद्ध है परंतु आगमकार ने यहां छह भाव बताएं हैं। तो ठाणं में आज मैंने यहां छह भावों पर थोड़ा प्रकाश डालने का प्रयास किया है।

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