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विभंग ज्ञान सात प्रकार का होता है- आचार्य महाश्रमण : आचार्य महाश्रमण जी

 AHINSA KRANTI NEWS
हैदराबाद। ठाणं आगम ने कहा गया है अतींद्रिय ज्ञान और इंद्रियों से होने वाला ज्ञान मति ज्ञान, श्रुत ज्ञान है । यह इंद्रिय मन से होने वाला ज्ञान है, परोक्ष ज्ञान है। अवधि ज्ञान और उधर विभंग ज्ञान, आगे मन:पर्यव ज्ञान, केवल ज्ञान, यह प्रत्यक्ष ज्ञान है, इन्हें इंद्रियों की अपेक्षा नहीं, सीधा देखने वाले हैं और सबसे ज्यादा सर्वोच्च प्रत्यक्ष ज्ञान हैं वह है, केवल ज्ञान। अतींद्रिय ज्ञान के ये तीन प्रकार हैं, अवधि ज्ञान या विभंग ज्ञान, मन:पर्यव ज्ञान, केवल ज्ञान।
ठाणं आगम में बताया गया है की विभंग ज्ञान सात प्रकार का होता है। पहला प्रकार बताया गया है लोक एक दिशा में ही है, यानी विभंग ज्ञान उसका इतना सीमित है कि वह किसी एक दिशा में ही देख सकता है, तो वह एक ही दिशा में देखता है तब उसे लगता है अरे मुझे तो विशिष्ट ज्ञान हो गया है और मैं देख रहा हूं यह दुनिया, यह लोक एक ही दिशा में है, लोग जो कहते हैं लोक पांच दिशा में है वह गलत कहते हैं, यह विभंग ज्ञान की उसकी गलत धारणा संभवत प्रतीत होती है।
 दूसरा प्रकार बताया है तथाकथित श्रमण महान को जो अतींद्रिय ज्ञान होता है उसमें पांच दिशाओं को वह अपने ज्ञान से देख सकता है तब यह मान लेता है कि मुझे तो अतिशय ज्ञान दर्शन प्राप्त हो गया है, मैं देख रहा हूं पांचों दिशाओं में लोक हैं, कोई ऐसा कहते हैं कि लोक एक दिशा में ही है, ऐसा कहने वाले गलत कहते हैं। अब यहां उसकी धारणा है कि लोक पांच दिशाओं में हैं, हो सकता है, निश्चय में केवली जाने। परन्तु कहीं उसकी धारणा में मिथ्यात्व हो सकता है।
 तीसरा प्रकार बताया है कि तथाकथित श्रमण महान को अतिंद्रिय ज्ञान होता है, वह अपने ज्ञान से देखता है,अरे कितने जीव हिंसा कर रहे हैं, कितने झूठ बोल रहे हैं, चोरी कर रहे हैं, मैथुन, परिग्रह, रात्रि भोजन कर रहे हैं, यह लोग पाप का काम कर रहे हैं तो यह पाप तो कर रहे हैं, तो यह जो पाप की क्रिया है उसी से आवृत हो रहे हैं,कर्म  का जो बंध होता है उसको वह नहीं देख पा रहा है ,तो वह मानता है कि नहीं, कर्म वाली बात नहीं है, क्रिया से ही जीव आवृत है ।यह उसकी विभंग ज्ञान की अवधारणा मिथ्यात्वी है कि वह कर्म बंध को नहीं मानता है, क्रिया को ही आवरण मानता है, और जो ऐसा कहते हैं कि क्रिया से आवृत नहीं है वह गलत कहते हैं यानी उनको वह मिथ्या कह रहा है, यह संभवतः उसकी गलत धारणा है।
 चौथा प्रकार बताया है कि वह तथाकथित श्रमण महान है उसको विभंग ज्ञान पैदा होता है तो वह अपने विभंग ज्ञान से देवताओं को देखता है और देवता जो है वो अपने शरीर के अवगाद क्षेत्र से बाहर और अपने शरीर के अवगाद क्षेत्र के भीतर, वो देवता पुद्गलो को ग्रहण करके विक्रिया करते हैं ,यह देखकर उसके मन में आता है कि मुझे तो विशिष्ट ज्ञान हुआ है ,यह जीव है वह पुद्गलो से ही बना हुआ है, यह उसके दिमाग में धारणा पनपती है, यह उसका ठीक धारणा का क्रम नहीं है,संभवत ऐसा प्रतीत हो रहा है ।पांचवा प्रकार बताया है वह जो तथाकथित श्रमण महान है उसको विभंग ज्ञान पैदा होता है तो वह देखता है कि देवता बिना पुद्गल के भी विक्रिया कर रहे हैं, वे देव पुद्गलों का स्पर्श कर, उनमें हलचल पैदा कर, विक्रिया करते हैं ,मुझे यह विशिष्ट ज्ञान दर्शन प्राप्त हुआ है।मैं देख रहा हूं कि जीव पुद्गलों से बना हुआ नहीं है,जो ऐसा कहते हैं की जीव पुद्गलों से बना है, वो मिथ्या कहते हैं।
छठा प्रकार है कि तथाकथित श्रमण महान ऐसी धारणा बना लेता है की जीव रूपी होता है, जो जीव को अरूपी कहते हैं, वो मिथ्या बोलते हैं। जीव तो अरूपी बताया गया है जबकि वह जीव को रूपी मान लेता है, ऐसी धारणा उस विभंग ज्ञानी के हो जाती है और संभवत यह एक उसकी मिथ्या मान्यता है कि जीव रूपी है।
सातवां प्रकार बताया हैं कि वह जो तथाकथित श्रमण महान है, विभंग ज्ञान से देखता है, अरे देखो लोक में होता क्या है कि सूक्ष्म वायु, मंद वायु से वो पुद्गल कम्पित हो रहे हैं, तब उसको लगता है अरे इस दुनिया में मुझे जो विशिष्ट ज्ञान प्राप्त हुआ है उससे लगता है यह सारे जीव हैं, ऐसा कहने वाले कि जीव भी है, अजीव भी है, वह मिथ्या है‌। यह उसकी गलत धारणा है। यह विभंग ज्ञान का सातवां प्रकार है। तो यह ठाणं में मैंने कल वह आज भी विभंग ज्ञान पर कुछ बातें बताने का एक प्रयास किया है।

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