स्वर्ग की सारी व्यवस्था कुवेर के हाथ में होती है – मुनि श्री समता सागर जी महाराज

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अहिंसा क्रांति / देवांश जैन

विदिशा(भद्दलपुर) – पुण्य योग से तीर्थ क्षेत्रों पर लोग पहुंच जाते है, तो वंहा जाकर वंदना करते हे एवं धर्म श्रवण करते है, वंही कुछ लोग  वाहरी रौनक, वाजार नाट्यगृह झूलाघर आदि, में ही उलझ कर रह जाते है, अपना टाईम पास कर वापिस आ जाते है,उपरोक्त उदगार मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने जैन तत्ववोध कक्षा में समवसरण का वर्णन करते हुये कहे। उन्होंने कहा कि क्षेत्र पर जाकर तीर्थ वंदना, धर्मश्रवण, पूजा , मुनि महाराज आदि है, तो उनको आहार आदि दैना चाहिये। उसी प्रकार भगवान के समवसरण में भी होता है, पुण्य के योग से समवसरण तक तो पहुंच जाते है, लेकिन वंहा की रौनक में ही इतने अधिक मग्न हो जाते है, कि  भगवान की गंघकुटी तक ही नहीं पहुंच पाते। मुनि श्री ने वताया कि समवसरण में भगवान की दिव्यध्वनी चार वार प्रातः, मध्याह्न, सांयकाल एवं मध्यरात्रि में होती है, एक वार में दो घंटे चौवीस मिनट तक देशना होती है, और जो श्रोता वंहा तक पहुंच जाते है, वह मग्न होकर सुनते है।

उन्होंने कहा कि दुनिया के किसी भी स्कूल में इतना लंवा पिरीयड नहीं लगता होगा और इसके वाद भी वीच में यदि सौधर्म या चकृवर्ती कोई आ जाए और उनकी कोई जिज्ञासा हो तो विशेष देशना भी हो जाया करती है, उन्होंने समवसरण के वैभव को वताते हुये कहा कि जैसे किसी संस्था का वित्त कोषाध्यक्ष के हाथ में होता है, उसी प्रकार स्वर्ग की सारी व्यवस्था कुवेर के हाथ में होती है, वंहा सौधर्म इन्द़ के आदेश से  संपूर्ण व्यववस्था का संचालन होता है।

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उन्होंने वताया कि तीर्थकंरों की संपूर्ण वस्त्राभूषण वाल्यावस्था से लेकर राज्याभिषेक तक की सभी व्यवस्थाऐं कुवेर करता है। मुनि श्री ने कहा हालांकि तीर्थंकर कोई आपेक्षा नहीं रखते लेकिन उनको पुण्य प्रकृति का ही वंध इतना तगड़ा होता है, कि सारी व्यवस्थाऐं स्वतः होती चली जाती है, भगवान की गंधकुटी तक वीस हजार सीड़ियां होती है और जैसे आप लोग आजकल एक्सीलेटर पर पैर रखते हो और सीधे ऊपर पहुंच जाते हो उसी प्रकार पहले ऐसी औषधियां लेप आदि होते थे कि उनको लगाते ही पहली सीड़ी पर पैर रखा और सीधे भगवान की गंधकुटी तक पहुंच जाते। उन्होंने वताया कि “तीर्थंकर भगवान जव तक मुनि अवस्था में रहते है तभी तक आहार होता है, कैवल्यज्ञान होंने के पश्चात तीर्थकंरों का आहार नहीं होता”

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