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आत्मा अनादिकाल से संसार की चार गति में भटक रही है : आचार्य भव्यदर्शन सुरीश्वर म.सा

AHINSA  KRANTI NEWS
मैसूरु : 25 जुलाई 2020। सुमतिनाथ जैन श्वेतांबर मूर्ति पूजक संघ के तत्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास कर रहे आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर तथा साध्वी वृंद भद्रिकाश्री ने धर्म संदेश मे कहा कि आत्मा अनादिकाल से संसार की चार गति में भटक रही है l इस अनादि कालीन श्रृंखला को काटने के लिए ज्ञानी भगवंतो ने करुणा करके धर्म मार्ग दिखाया है l दुर्गति से निजात पाने के लिए और सद्गति को प्राप्त करने के लिए धर्म ही एक मेव उपाय हैं l धर्म की व्याख्या करते हुए शास्त्रकार कहते हैं कि दुर्गति में गिरती हुई आत्मा को बचाकर सद्गति में स्थापन करता है – वह धर्म है l
अथवा तत्वामृति ने लिखा है कि जो दयायुक्त हैं, सर्व जीवो का हित करने वाला है l वो ही धर्म दुष्कर संसार से तारने के लिए समर्थ है l अष्टप्रकरण में लिखा है की धर्मी आत्मा के लिए अहिंसा सत्य अस्तेय (अचौर्य) मैथुन त्याग (ब्रह्मचर्य ) और (परिग्रह परिमाण )त्याग ये पांच पवित्र क्रिया रूप धर्म हैं l जब की यही बात महाभारत के शांति पर्व मे बताया कि अहिंसा,सत्य,अस्तेय, अपरिग्रह और मैथुन का वर्जन इन पांच मे सर्व धर्मो का समावेश होता हैं l घर में ही माता- पिता भाई -बहन व मित्र है l पार्श्वनाथ चरित्र में लिखा है कि बिना धर्म वाला मानव, बिना अक्षर वाला लेख, बिना प्रतिमा वाला मंदिर और बिना पानी वाला सरोवर है l
लक्ष्मी चंचल हैं l जीवित और घर परिवार अस्थिर हैं l जगत मे एक मात्र धर्म ही अचल स्थिर हैं l धर्म के चार दान, शील, तप, भाव प्रकार होते हैं l भावना से त्याग भावना पुष्ट होती है l भोग की भावना नष्ट होती हैं l शील से दुराचार से आत्मा सदाचार की ओर आगे बढ़ती है l तप से आहार की वासना पर रोक लगती है l भाव से दुष्ट विचारों और गलत सोच का नाश होता है l शुभभावनाओं की ओर आगे बढ़ते हैं l अतः चारों धर्म को जीवन में स्थान देना चाहिए l एक भी धर्म को गोण नहीं करना है l पाप और दुखों से संपूर्ण निजात देने का सामर्थ्य इस धर्म में ही है l बिना धर्म वाला मानव पशु के समान है l क्योंकि शास्त्र में हेमचंद्राचार्य कहते हैं कि धर्म तो आनाथ का नाथ है l शास्त्र में लिखा है धर्मो रक्षति रक्षित: अर्थात धर्म की जो रक्षा करता है, उसकी रक्षा धर्म हमेशा करता है ।

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