वही विद्यार्थी अपने जीवनकाल में सफल हो पाता है जिसकी निगाह अपने लक्ष्य की ओर होती है – मुनि श्री विनम्र सागर जी महाराज

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अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

विदिशा – जो महापुरुष होते है,वह एक बार यदि कोई संकल्प कर लेते है,और जब तक वह संकल्प पूर्ण नहीं होता तब तक उनको भी चैन नहीं मिलता उपरोक्त उदगार मुनि श्री विनम्रसागर जी महाराज ने मूकमाटी महाकाव्य की विवेचना करते हुये व्यक्त किये। मुनि श्री ने कहा कि जब भी कोई सकारात्मक विचार आपके हृदय में पैदा हुआ तो आप संकल्प शक्ती के साथ उसे पूर्ण कीजिये, जिन वच्चों की संकल्प शक्ती मजबूत होती है वही बच्चे सी. ऐ. सी.एस,तथा आई ए एस आई पी एस, मेडीकल, आदि काम्टीशन एग्जाम को निकाल पाते है।उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि गुरू द्रोणाचार्य ने सभी शिष्यों से पूंछा कि तुमको पेड़ पर क्या दिखाई दे रहा है तो किसी ने डाली तो किसी ने पत्ते आदि कहा लेकिन अर्जुन ने कहा कि मुझे तो अपने लक्ष्य के अलावा और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा, मुनि श्री ने कहा कि वही विद्यार्थी अपने जीवनकाल में सफल हो पाता है जिसकी निगाह अपने लक्ष्य की ओर होती है। मुनि श्री ने इलेवन इलेवन अर्थात 1111 दिन का रूल वताते हुये कहा कि आप किसी भी क्षेत्र में आगे बड़ रहे हो यदि पड़ाई कर रहे हो, या कोई व्यापार कर रहे हो या फिर साधना के क्षेत्र में आगे बड़े है, तो तीन साल तक आप वह कार्य को बिना कोई समीक्षा किये करते रहो.. यदि आपने इलेवन इलेवन का रूल्स अपनाया तो आप एक दिन अवश्य सफलता को प्राप्त करेंगे। मुनि श्री ने सभी विद्यार्थियों को सम्वोधित करते हुये कहा कि यदि पड़ाई कर रहे हो तो सिर्फ पड़ाई में ही ध्यान दो, यदि साधना कर रहे हो तो सिर्फ अपनी साधना की ओर ध्यान दो, और यदि आपका लक्ष्य किसी काम्पटीशन एग्जाम की ओर है तो अपनी संपूर्ण शक्ती को उस और लगादो। मुनि श्री ने कहा कि यदि आप अपने विचारों को इधर उधर बार बार पलटते रहे तो जिन्दगी में आप कुछ भी हांसिल नहीं कर पाओगे, और नकारात्मकता हांवी हो जाऐगी।उदाहरण देते हुये कहा कि मान लीजिये आपने व्यापार का मन वनाया और किराना की दुकान खोली नहीं चली या मन नहीं लगा और फिर कपड़े की दुकान खोल ली वह भी नहीं चली तो फिर तीसरे व्यापार पर सोचना शुरू कर दिया। इससे आप शुरू करने से पहले उस व्यापार की नकारात्मकता आऐगी और फिर कुछ भी हांसिल नहीं कर पाऐंगे। मुनि श्री ने कहा कि कोई भी कार्य करने में मन की स्थिरता चाहिये जिसका मन स्थिर होता है, उसके हाथ में हमेशा सफलता ही हाथ लगती है।दुकानदार यदि अपनी दुकान में वैठा रहे तो दुकान चल निकलती है। लेकिन आजकल इन्टरनेट का युग है, मन में स्थिरता नहीं होंने से बार बार इधर उधर की बातों को सर्च करता रहता है,स्थिरता से वह अपनी दुकान में नहीं वैठकर पड़ोसी की दुकान पर जाकर खड़ा हो जाता है, और इधर उधर की गप्प और निगेटिविटी में अपना समय वरबाद करता है। “मूकमाटी” में पूज्य गुरुदेव कह रहे है कि “साधना स्खलित जीवन में और क्या घटेगा, थोडी सी प्रतिकूलता में जिसकी समता आकाश को चूंमती थी उसे भी विषमता की नागिन सूंघ सकती है… और वह राही गुमराह हो सकता है उसके मुख से  फिर गम आह निकल सकती है,ऐसी स्थिति में वोधी की चिड़िया फुर्र क्यों न कर जाऐगी? मुनि श्री ने कहा कि साधना के क्षेत्र में भी मन को स्थिर करना पड़ता है, कभी यह शास्त्र उठाया और मन नहीं लगा फोरन दूसरे शास्त्र के पन्ने पलटने लगे इससे आपका समय तो ही नष्ट होगा ही साथ ही “आस्था की आराधना में विरादना ही सिद्ध होगी” उपरोक्त जानकारी श्री सकल दि. जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने दी।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन विदिशा,मध्यप्रदेश
संपर्क – 7828782835/8989696947

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