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परलोक में साथ में आने वाला भी धर्म ही है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म.सा 

मैसूर।  रविवार श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ महावीर भवन में चातुर्मास कर रहे आचार्य श्री भव्यदर्शन सूरीश्वरजी तथा साध्वीजी भद्रिकाश्रीजी म सा ने धर्म संदेश में कहा धर्म आत्मा को शांति देता है । धर्म समाधिभाव में रखता है । धर्म तो वर्तमान जन्म और भावि जन्म को शुभ बनाने वाला है । धर्म से मानव समृद्ध बनता है । परलोक में साथ में आने वाला भी धर्म ही है । धर्म से विघ्नों का विनाश होता है । धर्म जीव को नितीमान-इमानदार बनाता है । धर्म सदाचारी बनाता है । और दु:खों से उबारने का काम धर्म करता है । धर्म अगर आत्मा का स्वभाव बन जाता है तब दुनिया की कोई ताकत उसे परेशान नहीं कर सकती । आत्मा नीडर बन जाती है । अध्यात्मकल्पद्रुम ग्रंथ में लिखा है – धर्म प्राप्त होना आसान नहीं है । जैसे समुद्र में गिर गये जीव को प्रवहण मिलना दुष्कर है, जो संसार सागर से पार उतारने का काम करता है । अनार्य मानवको धर्म ऐसा ढ़ाई अक्षर का शब्द सुनने को नहीं मिलता । आर्यदेश में भी लाखों जीवो-मानवों को धर्म प्राप्त होने के बावजूद आराधना करने का दिल में भाव नहीं उठता ।

 

 

 

 

भूतकालीन जन्मों में कुछ न कुछ -कहीं न कहीं धर्म किया है तब ही मानवजन्म-आर्य कुल-धर्मसामग्री की प्राप्ति सुलभ बन पाई है । अब प्रमाद किया तो दुबारा मानव जन्मादि की प्राप्ति खूब दुर्लभ बन जायेगी । आत्मा आबादी से बरबादी की ओर चली जायेगी ।  पांच इन्द्रियों के विषयों, क्रोध-मान-माया-लोभ ये चार कषायों – मन – आहारादि चार संज्ञाओं का काम है आत्मधन को लूटने का ….. धर्म उन सबसे बचाने वाला, पूर्ण सुरक्षा देने वाला कवच है । धर्म पिंजरे में रही हुई आत्मा को लूटने की किसीकी ओकात नहीं है । धर्म कल्पवृक्ष से भी ज्यादा देने की ताकात रखता है । कल्पवृक्ष तो मांगने पर देता है । धर्म तो बिना मांगे भी देता है ।तत्त्वामृत ग्रंथ में लिखा है – जो मानव धर्मी होता है – वो कभी मरता नहीं है, अमर बन जाता है । और जो मानव पाप में डूबा रहता है वो जिंदा होते हुए भी मृत है । तमाम सदाचार का शिक्षण धर्म ही देता है । धर्मी आत्मा को अहिंसा-सत्य-क्षमा-दान-शांति-अपिशुनता-दया-निर्लोभता-कोमलता-लज्जा-तेज-धृति-पवित्रता-अद्वेष-नम्रता-विनय-विवेक-सरलता आदि गुणों की प्राप्ति होती है । मतलब यह हुआ कि – इन गुणों से धर्मी आत्मा की पहचान होती है । हम भी इन गुणों के अर्जन के लिए प्रयत्न करें । गुणार्जन करके इस जन्म को, भावि जन्मों को समुज्वल बनाकर मुक्ति के लिए पात्र बनें ।

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