जैन प्रवचन jain pravchanजैन समाचार

प्रमाद को झाड़ने वाला ही विजयी होता है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

अहिंसा क्रांति / ब्यूरो चीफ दलीचंद श्रीश्रीमाल

मैसूर । 13 अगस्त 2020 श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर तथा साध्वी भद्रिकाश्रीजी म. ने धर्म संदेश मे बताया कि – श्री तीर्थंकर भगवान के पास से गणधर भगवंत को त्रिपदी (उप्पन्नेइ वा विगमेइ वा धुवेइवा) प्राप्त होते ही मात्र 48 मिनिट में ही करोड़ो – खर्ब श्लोक प्रमाण द्वादशांगी की रचना कर लेतें है ।जब तक तीर्थंकर नामकर्म वाली और गणधर नामकर्म वाली आत्मा दोनों मिलते नहीं वहां तक द्वादशांगी निर्माण का कार्य संभवित बनता नहीं है ।

इसी ही कारण वैशाख सुद 10 को वीरप्रभु को केवलज्ञान प्राप्त हुआ, देशना भी दी । लेकिन द्वादशांगी की रचना या शासन स्थापना का कार्य संपन्न नहीं हुआ दूसरे दिन जब गणधर की आत्मा का आगमन हुआ. तब शास्त्र रचना और तीर्थस्थापना का कार्य संपन्न हुआ ।द्वादशांगी में सबसे पहला आचारांग गिना जाता है । आचारांग ग्रंथ में मुख्यतया साधु-साध्वी के आचारों का फरमान है । आचारों में क्या सावधानी रखना वह बताया है । सुक्ष्म-बादर जीवोें की, त्रस-स्थावर जीवों की रक्षा कैसे करना ? उस विषय का लंबा-चौड़ा वर्णन है । पृथ्वीकाय-अप्काय-तेउकाय-वाउकाय-वनस्पतिकाय में जीव की सिद्धि के बारे में अच्छी जानकारी देकर सही प्रमाण दिये है ।साधक ऐसे साधु के लिए एक अच्छी बात वहां लिखते है – ‘खणं जाणाहि पंडिए।’  मतलब, हे बुद्धिमान ! हे साधक ! समय को – अवसर को पहचान ।

अवसर का मूल्य समझ ले ।जो साधक अवसर पे – समय पे करने का कार्य चूक जाता है – वो लाभ के बजाय नुकसान का भागी होता है । नुकसान से बचना है और अवसर का पूरा लाभ उठाना है, तो सावधानी बरतना बहुत ज़रूरी है । समय पर कार्य न  करने वाले के एक कहावत प्रेरणा देती है । अब पछताये क्या होत है, ‘जब चीड़ियां चुग गई खेत।’ वीरप्रभु बार-बार गौतम का नाम लेकर हमारे जैसे प्रमादी जीवों को टटोलते थे – ‘समयं गोयम  मा पमायए।’ हे गौतम ! एक समय का भी प्रमाद मत करना । अलबत, गौतमस्वामी तो अत्यंत अप्रमत थे । लेकिन हमारे जैसे प्रमाद से घिरे लोगों को प्रभु का यह फरमान था – उपदेश था । प्रमाद को झाड़ने वाला ही विजयी होता है । प्रमाद से दोस्ती रखने वाला दुर्गतिओं में भटकता रहता है । अतः प्रमाद को शास्त्रकारों ने मृत्यु या शत्रु की उपमा दी है, अमुल्य मानव जीवन की सफलता के लिए उद्यमी बनें ।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Close