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जो सोता है वह खोता है: आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS

हैदराबाद। महातपस्वी, महामनस्वी, जन जन को अपने मंगल प्रवचनों से जागृत करने वाले, परमश्रद्धेय आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज  जैनागम ठाणं प्रवचन माला के अन्तर्गत व्याख्या करते हुए फरमाया कि हमारी श्रृष्टि में जीव भी है और अजीव भी है। जीवों में सिद्ध और संसारी दोनों होते है। सिद्ध जीव अब जन्म लेते नहीं और जन्म के बाद होने वाला मरण भी उनका होता नहीं। प्राणी के रूप में उनका उत्पाद होना अब बंद हो गया है।

संसारी जीव है वे उत्पन होते हैं और मरते भी है। संसारी जीव ८४ लाख जीव योनियों में भ्रमणशील है, समाविष्ट है। यहाँ वनस्पति जीवों का सन्दर्भ चल रहा है। धान जो अंदर पड़े है क्या इनकी उत्पादक शक्ति नष्ट हो सकती है व इनका कालमान क्या होता है ? इनकी उत्पादक शक्ति एक समय बाद नष्ट हो जाती है जिसका कालमान कम से कम अंतर मुहूर्त होता है। अंतर मुहूर्त यानि दो समय से लेकर 48 मिनट में एक समय कम तक का समय। इन धानों का ज्यादा से ज्यादा उत्पादक शक्ति  कालमान सात वर्ष का हो सकता है। उसके बाद उनकी उत्पादक शक्ति विध्वस्त हो जाती है व बीज अबीज हो जाता है और उनकी योनि का विच्छेद हो जाता है। यहाँ जीव-जगत की व्यवस्थाओं की अनेक जानकारियां उपलब्ध है। हम ध्यान दे कि योनि का विच्छेद तो होता ही है, प्राणी खुद भी नष्ट हो जाता है। ऐसी स्थिति में हमें क्या करना चाहिए। जीवन का भी एक दिन समापन होता है। ऐसे में हमें प्राप्त इस सुंदर मानव जीवन के सुयोग का पूरा लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए, अवांछनीय रूप में खोना नहीं चाहिए।आचार्यवर ने आगे कहा कि इस जीवन का लाभ उठाने के लिए हमें तप के साथ जप की भी साधना करनी चाहिए। कपाल तो फलता है पर भूपाल नहीं। सोये रहने वाले का काम पूरा नहीं होता। कहावत है “सूतां के तो पाडा ही जणे” अर्थात जो सोता है वह खोता है और जो जागता है वह पाता है।

हम कभी भी प्राप्त अवसर को न खोयें, बल्कि उसका लाभ उठा लें, वर्ना फिर पछताने से कुछ हाथ नहीं लगेगा। हमारे जीवन के बचपन, यौवन व बुढ़ापे की इन तीनों अवस्थाओं का धर्म के द्वारा लाभ हमें उठाते रहना चाहिए। हम इस विध्वंसधर्मा शरीर की सच्चाई को समझे, इस देह का हमें लाभ उठाते हुए अपनी आत्मा के कल्याण की ओर आगे बढ़ना चाहिए।पुज्यप्रवर ने आज चार तपस्वी साधुओं, मुनि चैतन्य कुमार जी, मुनि जिनेश कुमार जी, मुनि परमानंद जी व मुनि कुणाल कुमार जी को 9 व 11 की  तपस्या का पच्चखान करवाया  व प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आज इन चारो साधुओं ने तपस्या की है जिनमे एक तीन संतो का पूरा सिंघाड़ा है। एक पुरा सिंघाड़ा एक साथ तपस्या करे ऐसा मौका गुरुकुलवास में संभवतः पहला ही है व 9 की तपस्या करने वाले बाल मुनि भी संभवतः सबसे कम उम्र के साधु है। सभी तप के साथ जप भी करें, तप के प्रति मंगलकामना है।

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