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मोक्ष की इच्छा रखने का नाम मुमुक्षु नहीं, जो छोड़ना जानता हो उसका नाम मुमुक्षु है – मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज

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अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

विदिशा – लौकिक क्षेत्र में तो वह “विद्या दान”देते ही थे,लेकिन पारलौकिक क्षेत्र में भी इतने अच्छे से ज्ञान दैनै की कला जिसके पास है, उनका नाम शीतलसागर महाराज है,उपरोक्त उदगार मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज ने विदिशा गौरव मुनि श्री शीतलसागर जी महाराज के आंठवे दीक्षा दिवस पर अरहंत विहार जैन मंदिर में व्यक्त किये। मुनि श्री ने कहा कि मात्र “मोक्ष की इच्छा रखने का नाम मुमुक्षु नहीं” है, वल्कि जो छोड़ना जानता हो उसका नाम मुमुक्षु है,आप लोग तो दीक्षा दिवस एक दिन मनाते है, हम लोग तो दीक्षा दिवस प्रति पल हर अन्तर मुहुरत में मनाते है। उन्होंने कहा कि दीक्षा दिवस उस तिथी का नाम नहीं जिस दिन दीक्षा ली थी, वल्कि दीक्षा दिवस उस मनस्थिति  और परिस्थिति को वस्तुस्थिति के साथ याद रखने का नाम है। अपने मोह को कम कर सर्वस्त्र गुरू चरणों में समर्पण कर देने का नाम है।उन्होंने कहा कि पूज्यगुरूदेव के साथ मुनि श्री शीतलसागर जी महाराज का अन्य तीन महाराज के साथ पूर्णायु जवलपुर में चातुर्मास हो रहा है, जो कि हमारी और मुनि श्री विनम्र सागर जी महाराज की दीक्षा स्थली है।तथा उनकी दीक्षा स्थली शीतलधाम में हम सभी दस महाराज का चातुर्मास हो रहा है,और हम तो भावना भाते है कि अगला चातुर्मास उनकी दीक्षा स्थली पर हम सभी का एक साथ चातुर्मास पूज्य गुरूदेव के साथ हो। इस अवसर पर मुनि श्री विनम्र सागर जी महाराज ने कहा कि यदि”गजकेसरी योग” में सर्वगुण संपन्न व्यक्ती को यदि गुरु का साथ मिल जाऐ तो वह भी सदगुण संपन्न हो जाता है, यह बात सत्यार्थ के रुप में मुनि श्री शीतलसागर जी महाराज की दीक्षा ने सिद्ध कर दी। उन्होंने ज्योतिष शास्त्र की व्याख्या करते हुये कहा कि जब गुरु और चंद्रमा  एक साथ मिल जाते है, तभी गज केशरी सिंह योग वनता है,कार्तिक कष्णा अष्टमी 16 अक्टूबर  2014 के दिन  गज केशरी योग एवं सर्वार्थसिद्धि का तथा पुष्य नक्षत्र योग भी था इस प्रकार से तीनों पुण्य योग के साथ शीतलधाम से ढाई कि. मी.दूर दिन किलाअंदर के सुरेश चंद़ सतभैया परिवार में गुरूदेव की पाड़ना संपन्न हुई।जब कि एक दिन पहले आचार्य गुरूदेव का उपवास था लोगों को अनुमान था कि आचार्य गुरूदेव ज्यादा दूर नहीं जाऐंगे, लेकिन आचार्य गुरूदेव जब आहार के लिये शीतलधाम से निकले तो सवसे आखरी में खड़े मां वेटे के पास जाकर उनका पड़गाहन हुआ। वह मां वेटा कोई और नहीं ऋषीकेश भैया और उनकी मां ही थी जो कि शीतलधाम से लगभग ढाई किलोमीटर दूर किला अंदर बड़े जैन मंदिर के पास सतभैया निवास में प्रतिदिन इसभावना के साथ चौका लगाते थे  कि कभी तो गुरुदेव के आहार कराने का सौभाग्य मिलेगा।और वह दिन आखिर मिल ही गया। आहार चर्या के उपरांत गुरूदेव के  साथ ऋषी भैया लौट रहे थे,रास्ते में ही पूज्य गुरुदेव कुछ निर्णय कर चुके थे।जिसे शीतलधाम पहुंचकर मूर्तरुप प्रदान कर दिया। मुनि श्री ने ज्योतिष शास्त्र की चर्चा करते हुये कहा कि कार्तिक मास में चद्रमा के सामने यदि गुरु  वैठ जाऐ तो उसे अति धनलाभ का योग वनता है,आज स्थिति यह है कि मुनि श्री शीतलसागर जी महाराज से अधिक धनी कोई और नहीं जो कि आचार्य श्री के सर्वाधिक पास है।वह चंद़मा के समान शीतल है। गृहस्थ जीवन में जब वह प्रोफेसर थे तब भी शांत रहा करते थे एवं किलाअंदर मंदिर में पाठशाला को सम्हालते थे।उनका फोकस हमेशा गडंत के त्याग पर  रहता था और आज भी उनका फोकस उसी गडंत त्याग की ओर ही रहता है, जो बच्चे पाठशाला के यंहा पर आऐ है यदि वह गडंत त्याग करते हें,तो उनका दीक्षा दिवस मनाना सार्थक हो जाऐगा। उन्होंनै 2014 चातुर्मास की उस घटना का जिकर करते हुये कहा कि दीक्षा के तीन दिन पहले ही ऋषीकेश भैया हमारे पास आऐ थे और कहा कि आचार्य श्री तो शायद हमें जानते भी है या नहीं? कि मेंने भी उनसे ब्रह्मचर्य ब्रत ले रखा है,तो हमने उनसे कहा कि आप गुरुदेव के पास जाओ और चरण छूकर वैठ जाना और ऐसा ही हुआ जब ऋषीकेश आचार्य श्री के चरण छू रहे थे और गुरूदेव की नजरें उनके ऊपर थी आचार्य गुरूदेव के मनमोहन अंदाज से ही हम लोग समझ गये थे कि इस जीव का कल्याण होंने वाला है। आचार्य श्री ने मूकमाटी में लिखा है कि”अपनी कसौटी पर अपने आपको कसना वहूत सरल है, लेकिन इससे सही सही निर्णय नहीं होता क्यों कि अपनी आंखों की ललाई अपने आपको दिखाई नहीं देता वेटा… जो लोग थोड़ा वहूत समयसार का अध्यन कर लेते है और अपने आपको विद्वान मानने लगते है उनके लिये ही आचार्य श्री ने ये शव्द लिखे है, आचार्य श्री ऊपर से देखने में जितने सरल नजर आते है,अंदर से उतने ही कठोर भी है।शीतलसागर जी महाराज कहते है कि आचार्य श्री जी उंगली पकड़ कर चलाये, उंगली दिखाकर के चलाये, या उंगली तोड़कर चलाऐ अब रहना तो उन्ही के साथ है।मुनि श्री ने कहा कि गुरूदेव पहले शिष्य को प्रेम से लेकर आते है फिर वह उंगली दिखाते है कि ध्यान रखना यह मोक्ष मार्ग है? और यदि उंगली देखने के पश्चात भी यदि शिष्य नहीं समझता तो वह मन की उस उंगली को तोड़ना भी जानते है। आचार्य श्री ने अपने अनुभव से ही यह मूक माटी ग्रंथ को लिखा है,और उन्होंने माटी से कलश की ही स्थापना कि है, कभी कोई  चिलम की स्थापना नही हुई यह एक इतिहास है।इस अवसर पर मुनि श्री निस्वार्थ सागर जी महाराज ने भी शीतलसागर जी महाराज के साथ के स्मरण सुनाये।उपरोक्त जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन ने देते हुये बताया मुनिसंघ अरिहंत विहार जैन मंदिर में विराजमान है,तथा रविवारीय प्रवचन अरहंत विहार जैन मंदिर में ही होंगे।चित्र 2014 के दीक्षा समय का है,जिसमें ब्र. संजय भैया गंजवासौदा एवं ब्र.ऋषीकेश भैया विदिशा नजर आ रहे है। जो कि मुनि श्री समरस सागर जी, एवं मुनि श्री शीतलसागर जी के नाम से दीक्षा प्राप्त की।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन विदिशा,मध्यप्रदेश
संपर्क – 7828782835/8989696947

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