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जो भाषा मिष्ट है, शिष्ट हैं, वह भाषा विशिष्ट है : आचार्य महाश्रमण

ब्यूरो चीफ – राजेन्द्र बोथरा

हैदराबाद।  तेरापंथ धर्मसंघ की यशस्वी आचार्य परंपरा के उज्ज्वल नक्षत्र, राष्ट्रसंत, परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज पर्यूषण पर्व के चतुर्थ दिन परम आराध्य परम वंदनीय भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा के संदर्भ में गतांक से आगे बताते हुए कहा कि भगवान महावीर का जीव त्रिपृष्ट वासुदेव के रूप में जन्मा। उधर रत्नपुर के संग्राम प्रिय राजा अश्वग्रीव प्रति-वासुदेव के मन में जिज्ञासा हुई कि मेरी मृत्यु कैसे होगी। ज्योतिषी नें बताया कि आपकी मृत्यु किसी और के हाथों से होगी, राजा ने नाम जानना चाहा तो कहा उसका नाम बताना तो विधि-संगत नहीं है पर आपको दो लक्षण बता देता हूं – पहला – आपके चंड वेग राजदूत का अपमान करने वाला, दूसरा – बहादुरी से आतंकी शेर को मारने वाला।

अश्वग्रीव उसकी खोज में लग गया। एक बार कई स्थानों का भ्रमण करता हुआ चंडवेग पोतनपुर के राज दरबार में पहुंचा तो देखा वहां संगीत का कार्यक्रम चल रहा है।संगीत में लय, कंठकला व शब्द अच्छे होने चाहिए। राजा ने उसको सम्मान दिया, पर त्रिपृष्ट को यह अच्छा नहीं लगा तो उसने कह दिया – तुम बीच में क्यों आ गये ? सारी बात दूत ने जब राजा अश्वग्रीव को बताई तो उसे लगा – एक लक्षण तो मिल गया। राजा प्रजापति के पास कुछ किसान आकर एक शेर से अपनी रक्षा का अनुरोध करने लगे। राजा प्रजापति ने बारी बारी से इसका दायित्व राजाओं को सौंप दिया और जब उनकी बारी आई और वे जाने के लिए तैयार हुए तो राजकुमार अनुरोध कर स्वयं ही चले गए। उन्होंने ऊपर को नहीं मूल को ही पकड़ते हुए शेर की गुफा तक पहुँच कर, रथ से उतरकर, निशस्त्र होकर शेर की गुफा में नाद किया व शेर के बाहर आने पर दोनों जबड़ों को चीर डाला।

खबर चारों तरफ फ़ैल गई व अश्वग्रीव को उसी के मारने वाला होने का पूरा भरोसा हो गया व आगे की योजना में लग गया। राजकुमारों को सम्मानित करने का प्रस्ताव लेकर जब अश्वग्रीव का दूत पोतनपुर आया तो त्रिपृष्ट ने कहा कि ऐसे कमजोर के हाथों वे सम्मानित नहीं होना चाहते | फिर युद्ध हुआ और उसमें अश्वग्रीव को मार गिराया गया। त्रिपृष्ट वासुदेव व अचल बलदेव बने | पूज्य प्रवर ने आगे  बताया कि एक बार राजदरबार में संगीत का बड़ा मधुरिम कार्यक्रम चल रहा था | त्रिपृष्ट ने शैयापालक को कहा कि मुझे जब नींद आ जाये तो कार्यक्रम को बंद कर देना लेकिन संगीत वह मस्त होकर संगीत सुनने लगे व राजा को नींद आने पर भी संगीत बंद नहीं किया। यह राजा की आज्ञा का उल्लंघन था। आज्ञा का उल्लंघन व अपेक्षा की उपेक्षा अच्छी नहीं।हमारे संघ में साधु साध्विया आचार्य की आज्ञा का पालन करते है, गुरु जैसा बोले वैसा स्वीकार करते है। ग्रहस्थ भी ध्यान देवे की गुरु व बड़ों की आज्ञा का उलंघन ना हो, उनका सम्मान हो। राजा ने शैयापालक के कानों में गर्म शीशा डाला ,वह तड़प तड़प कर मर गया। कर्म कर्ता का अनुगमन करता है, राजेश्वरी नरकेश्वरी। भगवान महावीर की आत्मा वहां से मरकर सातवें नरक में ३३ सागरोपम के आयुष्य में गई। वहां से निकलकर फिर २१ वां भव शेर का हुआ।


*पर्युषण का चतुर्थ दिवस: वाणी संयम दिवस*आचार्य प्रवर ने आगे कहां कि आज पर्युषण पर्व का चौथा दिन वाणी संयम दिवस है। यह तो एक दिन का है, हम आगे भी वाणी संयम रखें। मौन करना अच्छा है पर अनावश्यक न बोलना एक बड़ा मौन है, जितना हो सके कम बोले अपनी वाणी पर लगाम रखें। इसके चार सूत्र है – १. मित्तभाषिता २. मृदुभाषिता ३. सत्य भाषिता ४. परिक्ष भाषिता। इन चारों सूत्रों को अपनाकर कोई भी वाणी का ज्ञाता बन सकता है। स्वरचित गीत के माध्यम से गुरुदेव ने वाणी संयम की महिमा का गुणगान किया व बताया कि क्रोध, लोभ, भय, हास्य, सर्वदा त्याज्य है। कड़वी भाषा बोलने से कोई फायदा नहीं होता है, कर्कश व्यवहार से विपत्ति आ सकती है। हमारी जीवन शैली ऐसी हो कि हम कम से कम बोले , सोच समझकर बोले। वाणी में गहराई हो बात में दम हो तो थोड़ी सी बात बोलने से भी काम हो सकता है। जितना बोलना अपेक्षित है उतना ही बोले। हमारी वाणी इतनी सस्ती ना हो, हमारे वचन रत्न है। ग्रहस्थ लोग इस बात पर विशेष ध्यान दे कि वाणी में विवेक हो, गुस्सा काम का नहीं, यदि गुस्सा आ जाए तो तुरंत उसका निवारण कर लें व शांति से काम ले।
इससे पूर्व मुख्य मुनि महावीर कुमार जी ने गीतिका के माध्यम से सत्य की महिमा बताई व साध्वी वर्या सम्बुद्घ यशा जी ने आत्मा के द्वारा आत्मा को देखने की प्रेरणा दी व सत्य के साथ जीने की प्रेरणा दी। मुनि जिनेश कुमार जी ,मुनि श्री मनन कुमार जी, मुनि श्री नय कुमार जी, साध्वी श्री कौशल प्रभा जी आदि ने भी वाणी संयम पर अपने विचारो कि अभिव्यक्ति दी।

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