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चॉकलेट मांगने वाला बच्चा आज मोबाइल्स मांग रहा है : साध्वी श्री प्रितिसुधा


AHINSA KRANTI NEWS

  
डाँ. प्रीति सुधा प्रिया* ने रुप रजत विहार में धर्म चर्चा करते हुए कहा कि इस शताब्दी की सर्वोत्तम देन कंप्यूटर है। ऐसा सोचना भौतिकता है। इस युग की देन है-बदलता परिवेश। कल तक चॉकलेट मांगने वाला बच्चा आज ipad मांँगता है, शर्तो में मोबाइल मांँगता है। कल तक नए कपड़ों को मांगने वाला बालक आज आईफोन मांगता है।उन्होने कहा कि यह बदलता हुआ वातावरण हमारा पैदा किया हुआ है। संयुक्त परिवार आज अनोखी बात है, मम्मी, पापा और मैं बस यही परिवार है। मन में यह अंहकार कि हम कमाकर जीवन निर्वाह कर सकते हैं उपयुक्त नहीं है।पेट तो पशु भी भरता है। रातों को नींद ना आना, दवाइयों का अंबार लगा देना और सुबह सुखी रहने का मुखौटा पहन लेना आज का चलन हो गया है।

उन्होने कहा कि शरीर का ज्वर थर्मामीटर बताता है परंतु मन की बीमारी को नापने वाला यंत्र आज तक नहीं बना इस बदलते परिवेश ने सच हमें बदल डाला है।सहन शक्ति तो टूट कर रह गई है। अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले आज के  आधुनिक इंसान ने टूटना तो सीखा पर झुकना उसे नहीं आता है ।छाछ पीने वाला क्या समझेगा कोल्ड ड्रिंक के बुलबुलों को। उन्होने कहा कि बदलता परिवेश देश, समाज, परिवार इंसान सबको अपने में समाहित कर रहा है। जिधर हवा का रुख है वहीं की चाल है। सभी कार्यों के पीछे स्वार्थ और लाभ हैं। इस बदलती दुनिया में अलादीन का चिराग है इंटरनेट।आधुनिक इंसान के पास उसकी हर इच्छा इन्टरनेट  पूरी कर रहा है।

दुनिया को जिन खिलौना बना दिया परन्तु आश्चर्य, तब भी आज असंतोष, अंकित और दुःखी उसका मन है। कभी हमारे दादा जी को तो मनो वैज्ञानिक डाँ की आवश्यकता न पड़ पर आज तो साइक्रेटिस्ट का व्यापार अच्छा चल पडा़ है। उन्होने कहा कि काउंसिल के आफिस के  बार लम्बी कतारें है। इसका मूल हमारे संयुक्त परिवारों का टूटना है। जहां पहले हमारी रक्षा में परिवार खड़ा था आज वहां हम अकेले और बेसहारा महसूस करते हैं -नई बीमारियां माइग्रेशन, टेंशन, डिप्रेशन, कोरोना पैदा कर ली है। इन मानसिक बीमारी का इलाज हमें स्वयं नई सोच के साथ करना होगा। परिवार से अलग रहने वाले क्या अब हमें परिवार में रहना सिखाएंगे? हे प्रभु!कैसा परिवेश है,है भगवान! कैसा वातावरण है।

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