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निश्चय से शरीर को आत्मा मानना गलत है : विराग सागर महाराज

अहिंसा क्रांति / सोनल जैन
भिंड। 22 जुलाई 202 परम पूज्य गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज ने कहा-
संसार में जितने भी पदार्थ वस्तुएं हैं सभी अलग-अलग धर्म पाए जाते हैं किंतु हर व्यक्ति के देखने का दृष्टिकोण अपना-अपना होता है वे एक ही वस्तु को अलग-अलग तरीके से कहते हैं जैसे राम को कोई पिता कोई पति कोई भाई तो कोई पुत्र कहता है यानी एक ही व्यक्ति के इतने रूप हैं लेकिन सभी का कहना सही है क्योंकि राम लव कुश की अपेक्षा पिता, सीता की अपेक्षा पति, लक्ष्मण की अपेक्षा भाई और दशरथ की अपेक्षा पुत्र है कहने का अर्थ है कि यदि आप की अपेक्षा सही है तो आपका कहना सही है यह तो व्यवहारिक दृष्टिकोण है किंतु यहां सामाजिक तंत्र ग्रंथ में आचार्य भगवन कह रहे हैं निश्चय से शरीर को आत्मा मानना गलत है यानी राम का संबंध किसी की आत्मा से नहीं है क्योंकि शरीर व आत्मा भिन्न भिन्न  है ,
आगम की दृष्टि से शरीर और आत्मा एक नहीं हो सकते और आगम का कथन कभी असत्य नहीं होता शरीर व आत्मा को एक माना जाए तो शरीर में से आत्मा के निकल जाने पर मुर्दे को भी देखना बोलना चलना आदि-आदि काम करना चाहिए किंतु ऐसा नहीं होता पूज्य गुरुवर ने कहा शास्त्र स्वाध्याय तर्क दृष्टि को मजबूत करता है तर्क से वस्तु की सिद्धि व ज्ञान की वृद्धि होती है अतः तर्क तो हो किंतु कुतर्क नहीं होना चाहिए।
आगन कहता है यह शरीर कुटुंब परिवार आदि कुछ भी इस शरीर के साथ नहीं जाता अपितु हमारे द्वारा किए शुभ अशुभ कर्मों के फल स्वरुप पुण्य पाप ही आत्मा के साथ अगले भव तक जाते हैं अतः हम आत्मा शरीर के भेद विज्ञान द्वारा ज्ञान विवेक बुद्धि को जागृत करें और आत्मा को पाप से बचाकर धर्मादी पुण्य क्रियाओं में लगाएं जो हमारे लिए कल्याणकारी हितकारी है।

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