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आत्मा ही परमात्मा है : विराग सागर महाराज

AHINSA KRANTI NEWS

भिंड,,,परम् पूज्य राष्ट्रसंत गणाचार्य 108 श्री विराग सागर जी महाराज ने परमात्म प्रकाश के माध्यम से जीवन में ज्ञान प्रकाश डालते हुए कहा संसार में लोग शरीर से राग के कारण उसे ही आत्मा मान लेते हैं अज्ञानी की धारणा है कि मैं तरुण हूं, वृद्ध हूं, रूपवान हूं, सूर्यवीर हूं, पंडित, कांति वान हूं, दिगंबर हूं, बौद्ध हूं, श्वेतांबर हूं। सत्य स्वभाव नहीं जानने के कारण ऐसी भ्रांति होती है बाल चेष्टा होने लगती है जो अज्ञान की चेष्टा है ज्ञानी में फ्रेंढता नजर आती है आचार्य जिनसेन जिन्होंने जन्म से कपड़े नहीं पहने दिगंबराचार्य कुंदकुंदाचार्य छोटी उम्र से दीक्षित हुए पर चेष्टा ज्ञानी  सी रही आत्मा की अवस्था को समझ परिपक्व योगी की दशा दिखती थी युवा गर्विष्ठ होता है आत्मा की नहीं शरीर की अवस्था है

सहजस्वभाव  में रहते हुए शरीर को पर मान लेना ज्ञान का लक्षण है इष्टोपदेश में कहां है आत्मा की मृत्यु नहीं है फिर डर क्यों व्याधि नहीं है तो दुख क्यों संकलेश्ता से आर्त ध्यान होता है महापुरुष दुख सबको नहीं सुनाते सुकुमाल आदि ने उपसर्ग परिषह को साधना का श्रंगार माना था विजय पाकर खुशी मनाते हैं रोना संकलेशता है ज्ञानी और अज्ञानी में अंतर है ज्ञानी समलेशित नहीं होता तत्वज्ञान से धर्म ध्यान में परिणति होती है स्वाध्याय रुचि नहीं है तो जीवन गुजार लेता है कर्मों का वजन बढ़ाता है पीड़ा हरने वाले नहीं हंसी उड़ाने वाले बहुत मिलेंगे वीतराग सहजानंद स्वरूप का चिंतन करें पूर्व कृत कर्म उदय में आए

संकलेष्ता रखो तो कर्म आश्रव बढ़ेगा हंसते हंसते कर्म भोगेगे तो कार्य करेंगे कि कीटाडू भी रो कर कर्म भोग रहे हैं सच्चे संत प्राण अंत तक संयम के क्षेत्र में डटे रहते हैं दिल दिमाग में यह बातें आती हैं तो तत्वज्ञान जागृत होता है जैसा दिखता वैसा होता नहीं यह संसार माया जाल है सर्वज्ञ सब जानते हैं अतः करनी को छुपाया नहीं जा सकता आत्मा परमात्मा है अस्तित्व की अपेक्षा सारे भिन्न-भिन्न है आत्मा एक शाश्वत है मृत्यु के पश्चात अकेले जाना पड़ता है वसुधा ही कुटुंब है संबंध टूटते रहते है वैराग्य की जननी ज्ञान है।

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