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सूर्यग्रहण का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों ही क्षेत्रों में काफी महत्व है : देवेंद्रसागरसूरि

AHINSA KRANTI NEWS

आज के दिन होने वाले सूर्य ग्रहण पर अपने विचार रखते हुए आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कहा की यह तो स्पष्ट है कि सूर्य में अद्भुत शक्तियाँ निहित हैं और ग्रहण काल में सूर्य अपनी पूर्ण क्षमता से इन शक्तियों को, इन रश्मियों को विकीर्ण करता है, जिसे ध्यान-मनन के प्रयोगों द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है,किन्तु उतना ही जितना हमारे शरीर में क्षमता है। ग्रहण का शाब्दिक अर्थ ही लेना, अंगीकार या स्वीकार करना है। हमारे श्रृषि मुनियों नें इतना  ज्ञान हमारे सम्मुख रखा है जिसका अनुमान लगाना,अर्थात  ज्ञान से ज्ञान को प्राप्त करना ही जीवन की सार्थकता है। अपने भीतर के अन्धकार को मिटाने के लिए दैविक आराधना,पूजा अर्चना इत्यादि विशेष पर्वों पर करते रहने का विधान है।जैसा कि ग्रहण काल में उत्तम यौगिक क्रिया,पूजा अनुष्ठान,मन्त्र सिद्धि,तीर्थ स्नान,जप दान आदि का अपना एक विशेष महत्व है।

वे आगे बोले की
सूर्य ग्रहण काल में सूतक नियम लगने के कारण ग्रहण के बाद ही पूजा, अनुष्ठान, दान आदि कार्य करने चाहिए, तथा इसके मध्य की अवधि में मंत्र सिद्धि, जप, तप कार्य किये जा सकते है. आधुनिक युग के बुद्धिजीवियों के अनुसार इस काल में ध्यान, मनन, जप, उपवास आदि कार्य करने का कोई सार्थक औचित्य नहीं कहा गया है.
इस प्रकार की अवधारणा का जन्म शायद व्यवसायिकरण के फलस्वरुप हुआ है. लालच के बढते हाथों ने व्यक्ति को काफी हद तक स्वार्थी बना दिया है. जहां उसे लाभ न हो, उस कार्य में आज का व्यक्ति समय लगाना ही नहीं चाहता. और अगर वह लगाता भी है तो कार्य पूरा होने के बाद अपनी मनोइच्छा पूरी होने की शर्ते रख देता है, ऎसे में ध्यान, मनन, जप और उपवास जैसे कार्य कितना पुन्य देते है,

इस विषय पर संशय रहेगा. पर इन कार्यो का दूसरा पहलू देखे तो चाहे स्वार्थ भावना के कारण ही सही व्यक्ति कुछ समय के लिये ध्यान व धार्मिक क्रियाओं से जुडता तो है, कम से कम कुछ क्षण तो वह अच्छे कार्य करने का प्रयास करता है. अभी कुछ समय बाद ही सूर्य ग्रहण होगा अब यदि आप वैज्ञानिक विचारधारा के पक्षधर हैं तो प्रकृ्ति प्रदत्त इस अद्भुत नजारे का आनन्द लीजिए और यदि आपकी दृ्ष्टि में इसका कोई आध्यात्मिक महत्व है तो अपने इष्टदेव का ध्यान,जाप कीजिए,तीर्थस्नान कीजिए। 

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