जैन प्रवचन jain pravchanजैन समाचार

श्रमण तपस्या करने वाला होता है, श्रम करने वाला होता है : आचार्य श्री महाश्रमणजी

*
अहिंसा क्रांति /राजेंद्रबोथरा
हैदराबाद 10 जुलाई 2020 । आचार्य श्री महाश्रमणजी ने आज अरोरा कॉलेज में प्रवचन में फरमाया की आर्हत वांग्मय के एक आगम ठाणं में कहा गया है, शास्त्रकार ने बताया है श्रमण भगवान महावीर ने जब दीक्षा ली थी, अगार से अनगारता में प्रवर्जित हुए थे, तब अपानक षष्टभक्त रूप में थे। जैन शासन में तपस्या का क्रम चलता है, चतुर्मास में तो विशेषतया चलता है,भगवान महावीर ने दीक्षा लेने के बाद तो बहुत कठोर तपस्या की थी परंतु दीक्षा से पहले जिस दिन दीक्षा ली उस दिन की बात शास्त्र में बताई गई है, जिस दिन दीक्षा ली वह दिन था मिगसर कृष्णा दशमीं का, उस दिन भगवान महावीर यानी मुमुक्षु वर्धमान के बेले की तपस्या थी ,उस बेले की तपस्या में उन्होंने साधुत्व को, श्रमणत्व को स्वीकार किया, यहां श्रमण भगवान महावीर कहा गया है।
आगम का शब्द है श्रमण, श्रमण कौन होता है? यूं तो साधु श्रमण होता है, हम शब्द की दृष्टि से देखें तो श्रमण तपस्या करने वाला होता है, श्रम करने वाला होता है। महावीर के लिए श्रमण शब्द आगम का है ,भगवान महावीर तो परम तपस्वी थे उनके लिए एक विशेषण दिया गया है आगम में “श्रमणे”। दूसरा विशेषण है “भगवन‌्” , भगवान शब्द पूज्य के अर्थ में प्रयुक्त होता है, ज्ञानवान, वीर के लिए भी प्रयुक्त होता है ।अब आगे लिखा है अपानक षष्टभक्त तपस्या, षष्टभक्त क्या होता है?अपानक क्या होता है? ये तपस्या के दिनों की संज्ञा है, देखिए उपवास की संज्ञा है चतुर्थभक्त, बेले की संज्ञा है षष्टभक्त, तेले की संज्ञा है अष्टमभक्त, चोले की संज्ञा है दशमभक्त और पंचोले की संज्ञा है द्वादशभक्त ।भगवान महावीर ने षष्टभक्त यानी बेले की तपस्या,बेला भी कैसा अपानक, बिना पानी का, यानी चौविहार बेला,अपानक षष्टभक्त के रूप में दीक्षा ली थी। दीक्षा के लिए कहा गया है मुंड होकर, मुंड क्या होता है? आगम में दस प्रकार के मुंड बताए गए हैं ,हम संक्षेप में समझे, एक मुंड तो केशों को उतार देना, एक मुंड है विकारों को छोड़ देना, तो यहां मुंड का अर्थ शिरोमुंड तो मान ही ले साथ में दीक्षा ली तो मानो विकारों, पापों को भी छोड़ दिया, तो वैसे भी मुंड मान ले। भगवान महावीर ने लोच दीक्षा से पहले भी किया, यानी दीक्षा से पहले लोच जो किया वह खुद ने अपने हाथ से किया।
भगवान महावीर ने पंचमुष्ठी लोचन किया,उसके बाद दीक्षा ली, दीक्षा किस रूप में,अगार से अनगार रूप में। यहां यह बताया गया है कि भगवान महावीर ने खास प्रतिपाद्य, अपानक षष्टभक्त तपस्या में अनगारत्व, प्रवज्या ग्रहण की। भगवान महावीर ने युवा अवस्था में दीक्षा ली, अब एक प्रश्न है युवावस्था में दीक्षा क्यों ली, बचपन में क्यों नहीं ली? ऐसा होने का एक कारण यह है कि वे जब गर्भावस्था में थे तब उन्होंने मां की तकलीफ को कम करने के लिए  हलन- चलन बंद कर दिया, लेकिन यह उल्टा हो गया मां की तकलीफ अब ज्यादा हो गई, मां उदास होकर शोक सागर में डूब गई, तब वर्धमान ने अपने ज्ञान से देखा तो उन्हें पता चला की मां की तकलीफ तो अब बढ़ गई है और वापस हलन चलन शुरू किया, तब मां को शांति हुई व विश्वास हुआ कि मेरा गर्भ सुरक्षित है।
उस स्थिति का आकलन करके वर्धमान ने गर्भावस्था में विचार किया व संकल्प किया कि माता-पिता जब तक संसार में है तब तक मैं दीक्षा नहीं लूंगा ताकि मां बाप को तकलीफ नहीं पड़ जाए। यह उनका गर्भावस्था का संकल्प था जो अभिग्रह लिया उसको अक्षरश: निभाया। करीब 28 वर्ष के युवा थे वर्धमान तब मां- बाप ने संथारा लिया और उनका प्रयाण हो गया।अब वर्धमान ने सोचा जो मैंने अभिग्रह लिया था वह पूरा हो गया ,अब मैं साधु बन सकता हूं, तब उन्होंने अपनी भावना परिवारजनों के सामने रखी कि अब मैं मेरे दीक्षा के प्रयोजन को सिद्ध करना चाहता हूं, साधु बनना चाहता हूं। भाई नंदीवर्धन ने कहा दो वर्ष राजकीय शोक चलेगा तब तक तुम्हें रुकना होगा, वर्धमान ने उस बात को भी मान लिया और कहा दो बरस मैं विशेष साधक के रूप में रहूंगा। दो वर्ष साधक के रूप में रहे,करीब 30 वर्ष के युवा हो गए तब उन्होंने दीक्षा उत्सव के बाद दीक्षा स्वीकार की। शास्त्रकार बता रहे हैं अपानक षष्टभक्त तपस्या में श्रमण भगवान महावीर ने अगार से अनगारत्व में प्रवर्जीत होने की दीक्षा स्वीकार की। यह बात ठाणं में बताई गई है।

Related Articles

Back to top button
Close