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दूसरों के दुखों को महावीर की तरह करुणा भाव से देखें : देवेंद्रसागरसूरि

बैंगलोर। राजाजीनगर के लुणियाभवन में आचार्य श्री देवेंद्रसागरजी ने कहा की सुख का मतलब हर किसी के लिए अलग-अलग है। कोई मजदूर जब अपना गांव छोड़कर शहर जाता है, तो लोग टिप्पणी करने लगते हैं कि उसके मन में पैसे की भूख बढ़ गई है। कोई किसान जब खेती के लिए बैंक से कर्ज लेने की कोशिश करता है तो उसे फिकरे सुनने पड़ते हैं कि ऋण लेकर घी पीने का लोभ सवार हो गया है। ऐसा सोचने वाले इक्का-दुक्का ही होते हैं कि मजदूरों के अपने भरण-पोषण में देश का विकास भी जुड़ा हुआ है। किसानों की अच्छी फसल सिर्फ उनका पेट ही नहीं, देश का भी पेट भरेगी। वे आगे बोले की  सामान्य जन अगर गिड़गिड़ाने की हालत में पहुंच गया है, तो मान लेना चाहिए कि उसकी परेशानी से कोई परेशान नहीं है।

यह एक अजीब स्थिति है कि कोई किसी और को सुख में देखना नहीं चाहता है। कोई यह भी नहीं चाहता की अगर हम सुखी रहें तो पड़ोसी को भी सुखी रहना चाहिए। दूसरों के दुख से आनंदित होने वाला यह मन कितना छोटा है। हमारी परंपरा में मन को हमेशा विराट बनाने पर जोर दिया गया है। लेकिन यह विरोधाभास भी है कि मजदूर, किसान या सामान्य जन के दुख भरे जीवन पर हम द्रवित नहीं होते हैं। उल्टे उनके दर-बदर होने, तपती धरती पर रेंगने, भूख से बिलबिलाने और जान गंवाने को गंभीरता से लेने की बजाय हम विवाद का विषय बना देते हैं। इससे यह साबित होता है कि मनुष्यता अपनी धुरी पर नहीं है। आज समय मिला है कि परंपरा और संस्कृति की दुहाई देने के साथ-साथ हम अपनी मानसिकता, कथित संस्कारों और नीतियों पर पुनर्विचार करें। यह सुनिश्चित करें कि क्या गलत है और क्या सही। हम महावीर, बुद्ध, गांधी के विचारों का ढिंढोरा पीटते हैं, लेकिन विचारों को व्यवहार के स्तर पर लाने में पीछे हो जाते हैं। महावीर ने कहा है, ‘परस्पर उपकार, परस्पर प्रेमपूर्ण सहयोग ही जीवों का लक्षण है। अगर वह हमारे अंदर नहीं है तो जीवन किस काम का।’ इसलिए जरूरी है कि अभावग्रस्त क्षेत्रों की पहचान करें। लोगों के दुखों को महावीर की तरह करुणा भाव से देखें और समरसता के रास्ते पर चलते हुए निराकरण करें। 

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