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विश्व मैत्री का पवित्र पर्व है संवत्सरी: संत चन्द्रप्रभ


संवत्सरी महापर्व पर सकल जैन समाज ने किया मूल कल्पसूत्र का श्रवण एवं सामूहिक आराधना

AHINSA KRANTI NEWS

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जोधपुर, 21 अगस्त। राष्ट्र-संत महोपाध्याय चन्द्रप्रभ सागर महाराज ने कहा कि संवत्सरी विश्व मैत्री का पवित्र पर्व है। यह भाई-भाई, सास-बहू, देराणी-जेढाणी, पिता-पुत्र और पड़ोसी-पड़ोसी को आपस में बन चुकी दीवारों को हटाकर निकट आने की प्रेरणा देता है। जो व्यक्ति संवत्सरी पर्व मनाने के बावजूद मन में किसी के प्रति वैर-विरोध या थोड़ी-सी भी प्रतिशोध की भावना रखता है उसके सारे धर्म-कर्म-पुुण्य निष्फल हो जाते हैं। धर्म की नींव है टूटे हुए दिलों को जोडऩा एवं जुडऩा। जो धर्म इसके विपरित करता है वह धर्म नहीं मानवता के नाम पर कलंक है। उन्होंने कहा कि अपरिचित व्यक्ति से क्षमायाचना करना आसान है, पर आपस में कोर्ट केस चलने वाले दो लोगों के द्वारा आपस में क्षमायाचना करना तीस उपवास करने से भी बड़ी तपस्या है। हमसे उससे क्षमा मांगे जिससे हमारी बोलचाल नहीं है ऐसा करना मिच्छामी दुक्कड़म् के  पत्र या एसएमएस करने से भी ज्यादा लाभकारी होगा। भगवान को आपके लठ्ठू-फल-मिठाईयां या रुपये नहीं, मन में पलने वाली अहंकार, गुस्सा और ईष्र्या और वैर-विरोध की गांठे चाहिए ताकि वह आपको पापों से मुक्त कर सके।


संत चन्द्रप्रभ शनिवार को कायलाना रोड़ स्थित संबोधि धाम में आयोजित ऑनलाइन पर्युषण पर्व प्रवचनमाला के आठवें दिन संवत्सरी महापर्व पर संवत्सरी का रहस्य एवं आलोयणा विषय पर श्रद्धालु भाई-बहिनों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि
रूप, धन, पद या उम्र से व्यक्ति बड़ा नहीं होता। बड़ा वही है जो माफी मांगने के लिए दो कदम आगे बड़ा देता है। उन्होंने वर्ष भर में हो चुके हिंसा, झूठ, चोरी, दुशील, परशोषण, ज्ञान व ज्ञानियों की आशातना, परमात्मा का अनादर, दूसरों का दिल दुखाना और क्र ोध,मान, माया, लोभ के वशीभूत होकर हो चुके  दुष्कृत्यों की सबको आलोयणा करवाई।

आलोयणा करते हुए ऑनलाइन देख रहे सभी सत्संगप्रमियों की आँखें भर आई। सभी ने भविष्य में दुष्कृत्य न करने व अपनी आमदनी का एक हिस्सा दीन-दुखियों के  नाम करने का संकल्प लिया। विवेकवान बनने की प्रेरणा देते हुए संतप्रवर ने कहा कि हम बुद्धिमान बनने से पहले विवेकवान बनें। विवेक रहित बुद्धि जहाँ व्यक्ति का पतन कर देती है वही विवेक युक्त बुद्धि व्यक्ति का उत्थान। जो गलती करे वह इंसान है, जो बार-बार गलती करे वह शैतान है, पर जो गलती का सुधार कर ले वही इंसान भगवान है। हम गलती करें, पर एक गलती को दुबारा कभी न करें। हम बुरा करने वाले का बुरा करें यह अच्छी बात है, पर उसे माफ कर दें तो यह उससे भी अच्छी बात होगी। हम दूसरों को माफ करने का व माफी मांगने का बड़प्पन दिखाएं ताकि यह पर्व धन्य हो सके।
इस दौरान सकल जैन समाज ने मूल कल्पसूत्र का श्रवण करते हुए सामूहिक आराधना सम्पन्न की। कल्पसूत्र का लाभ श्रीमती संतोष देवेन्द्र गेलड़ा ने लिया।
ट्रस्ट की ओर अध्यक्ष स्वरूपचंद बच्छावत द्वारा सभी श्रद्धालुओं की ओर से गुरुजनों को ऐतिहासिक प्रवचनमाला प्रदान करने हेतु आभार प्रकट किया एवं सभी से सामूहिक क्षमायाचना की।

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