जैन गुरु

सद ध्यान और एकाग्रता : आचार्य श्री महाश्रमण

अहिंसा क्रांति / राजेन्द्र बोथरा

तेरापंथ के आचार्य श्री महाश्रमण जी अभी अपनी धवल सेना के साथ सोलापुर ( महाराष्ट्र) के निकट ब्रह्मदेव माने इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के विशाल परिसर में विराज रहे है।
आज प्रवचन के दौरान आपने फरमाया कि शास्त्रकार ने विशुद्धि के कुछ कारण बताए है | स्वाध्याय व सद्कर्मों में रत्त रहने से विशुद्धि होती है | विशुद्धि के लिए सवंर की साधना के साथ ,निर्जरा, तपस्या का होना भी ज़रूरी होता है वरना काम पूरा नहीं होगा |

विशुद्धि स्वाध्याय से भी होती है व ध्यान से भी होती है | लेकिन ध्यान के साथ एकाग्रता कैसी हो ? आर्त व रौद्र ध्यान अशुभ ध्यान की कोटि में आते है व इनसे कर्म बंध होते है जबकि धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान शुभ ध्यान होते है व इनसे कर्मों का क्षय होता है | प्रिय के प्रति राग और अप्रिय के प्रति द्वेष आर्त ध्यान तथा हिंसा, झूठ,चोरी आदि से जुडी चेतना रौद्र ध्यान के रूप होते है | शुद्धता के साथ शुभ चिन्तन में एकाग्र होना शुभ ध्यान एवं अ जुड़ते ही अशुद्धि ध्यान साधना| एकाग्रता तो बगुले में भी होती है पर मछलियों को मारने में | यह असद, अशुभ व अप्रशस्त ध्यान होता है | प्रमत्त ध्यान कर्म बंध के हेतु जबकि अप्रमत्त ध्यान कर्म मुक्ति की साधना | शरीर में सिर तथा वृक्ष में मूल की तरह धर्म में ध्यान का स्थान है | शरीर व वाणी की स्थिरता मन की एकाग्रता में सहायक होती है | नमो सिद्धाणं का प्रयोग एकाग्रता ज्ञापित करने का प्रयोग है,वृद्ध अक्षम शरीर वाला व्यक्ति भी सद् ध्यान का प्रयोग कर चेतना को निर्मल बना सकता है वस्तुतः ध्यान राग, द्वेष मुक्त होना चाहिए| मूल आत्मा की शुद्धि कायोत्सर्ग द्वारा होती है| तपस्या ,आध्यात्मिक सेवा, कर्म निर्जरा के द्वारा आत्म शुद्धि होती है|

संप्रसारक-
आचार्यश्री महाश्रमण चातुर्मास व्यवस्था समिति- हैदराबाद

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