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सृष्टि संचालन में नियम काम करते हैं : आचार्य महाश्रमण जी 

AHINSA KRANTI / RAJENDRA BOTHRA
हैदराबाद। ठाणं सूत्र में छह महीने तक होने वाले चार कार्यों का वर्णन मिलता है | जो नियमों के आधार पर चलते हैं | देवों के भी अपने नियम होते है | देवों का जन्म गर्भ से नहीं बल्कि उपपात से होता है | चरमचंचा असुरकुमार देवों की राजधानी होती है। प्रत्येक इंद्र के स्थान में उत्कृष्ट रूप से 6 महीनों तक उपपाद ग्रह हो सकता है, सिद्धि गति में उत्कृष्ट रूप से 6 महीनों तक उपपाद का ग्रह हो सकता है । हमारी सृष्टि इस अनंत आकाश में समाहित है ,जैन दर्शन में द्रव्य बताए गए हैं |इनमें एक है आकाशस्तिकाय। आकाश अनंत है आकाश का कहीं अंत नहीं है और इस आकाश के दो भाग हो जाते हैं लोकाकाश, अलोकाकाश । लोकाकाश  अनंत है।  संपूर्ण आकाश के बीच में मानव समुद्र के बीच में छोटा सा टापू हो ऐसा हमारा एक यह लोकाकाश है ।
मानो संपूर्ण आकाश में यह लटकता हुआ सा एक तत्व है लोकाकाश । अलोकाकाश तो अपने आप में शून्य हैं  वहां कोई जीव नहीं होता, शून्य है केवल आकाश है । लोकाकाश में हमारी दुनिया है।अनंत- अनंत प्राणी सारे के सारे इस लोकाकाश में ही है| पेड़ ,पौधे ,पर्वत, समुंद्र आदि आदि चीजें यह सब की सब चीजें लोकाकाश में ही है| सारे पशु, पेड़, मनुष्य सभी नारकीय जीव सभी के सभी इसी लोकाकाश  में समाहित है। धर्मास्तिकाय भी लोकाकाश में है और अधर्मास्तिकाय भी  लोकाकाश में है।  यानी कि यह है हमारी सृष्टि जो दिख भी रही है यह  सृष्टि लोकाकाश  में आकाश मात्र है। ठाणं आगम  में सृष्टि का नियम एक प्रकार का नियम बताया है । हमारी सृष्टि के भी अनेक नियम है ,नियमों से मानो सृष्टि चल रही होगी |देवजगत के अपने नियम है, मनुष्यजगत के अपने नियम है तिर्यचों के अपने नियम हैं , नारकीय  जीवों के अपने नियम हैं।  इस सृष्टि को हम  इस रूप में चार भागों में बांट सकते हैं कि नरकजगत, तिर्यचंजगत, मनुष्यजगत और देवजगत । फिर आगे मोक्ष का जगत मान ले। और देव जगत के अपने नियम हैं ठाणं में 6 महीनों संबंधी नियम बताए हैं | इसमें 4 नियम बताए गए हैं चारों नियम विरह के संदर्भ में है। पहली बात बताई गई है कि चरमचंचा राजधानी अधिकतम 6 महीनों तक नए देवों की उत्पत्ति से वंचित रह सकती हैं|
दूसरा नियम बताया है इंद्र का। देव जगत में इंद्र होते हैं जिस प्रकार हमारे तरह मनुष्य में चक्रवर्ती सम्राट होते हैं ,लोकतांत्रिक प्रणाली  में जैसे राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री सरकार होती है राष्ट्रपति देश का प्रमुख होता है | मनुष्य में चक्रवर्ती वासुदेव भी होते हैं इसी प्रकार देव जगत में मुखिया भी होते हैं |देव जगत में दो तरह की व्यवस्थाएं -एक व्यवस्था के अनुसार कोई इंद्र होता है मुखिया होता है। एक व्यवस्था कोई मुखिया नहीं है सब अपने आप में मुखिया।जैसे देव जगत में  बहुत ही उच्च कोटि के देव है ।
उनके जगत में कोई मुखिया नहीं होता, कोई एक इंद्र नहीं होता,  14 विभाग ऐसे हैं जहां कोई मुखिया नहीं होता। बाकी का जो देव जगत है, इस जगत में मुखिया की व्यवस्था है।  इस देव जगत में 64 इंद्र होते हैं। भवनपति  10 प्रकार है ,जंतर में 32 इंद्र होते हैं, ज्योतिष्क में 2 इंद्र होते हैं, और जो 12 देव लोक हैं उसमें 10 इंद्र होते है,नौंवे और दसवें देवलोक का एक इंद्र,ग्यारहवे और बारहवें का 1 इंद्र और बाकी  एक एक के आठ।  64 इंद्रदेव जगत में होते हैं यहां शास्त्र  इंद्रो का एक नियम बता रहे हैं। जैसे एक इंद्र कोई है उसका आयुष्य पूरा हो गया दूसरा मुखिया चाहिए परंतु दूसरा पैदा हुआ नहीं, तो कभी-कभी यह अंतरिम काल के 6 महीने तक वह स्थान इंद्र के बिना खाली रह सकता है। तीसरा नियम है निचली सातवी पृथ्वी में, नरक लोक में 6 महीनों तक का काल ऐसा हो सकता है कोई भी नारक पैदा नहीं होता। ऐसा काल मान अधिकतम 6 महीनों तक रह सकता है । चौथा नियम बताया है मोक्ष का। सिद्धि गति में उत्कृष्ट रूप में मनुष्य ही मर करके मोक्ष में जा सकते हैं।  न तो देवता जा सकते, ना नारकीय गति के जीव जा सकते, केवल मनुष्य ही मोक्ष में जा सकते हैं और मनुष्य मोक्ष  में जाते रहते हैं परंतु ऐसा ग्रह काल आ सकता है उन छह महीनों में कोई भी  जीव मोक्ष में नहीं जाता| शास्त्रकार ने यह 4 नियम  हमारी सृष्टि के 6 नियमों के अधिकतम ग्रह,व्यवधान बताए हैं|
यह सृष्टिगत व्यवस्था है क्योंकि हमारी जो सृष्टि है लगता है आखिर वह भी नियमों से चलने वाली है |सृष्टि में जो भी घटनाएं होती है, अब देखिए हमारी छोटी सी सृष्टि कभी यहां भयंकर बाढ़ आ जाती है, कभी तूफान चलता है ,कभी बीमारी फैल जाती है तो यह सब सृष्टि के होने वाले अपने अपने घटना क्रम है| अब यह अलग बात है हमें नियमों की जानकारी है अथवा नहीं है। लेकिन यह सृष्टि का संचालन जो हो रहा है, उसमें नियम काम करते हैं।  जैसे एक राष्ट्र चलता है, राष्ट्र का अपना विधान होता है ,संविधान होता है |जैन दर्शन में ऐसे कुछ नियम हमें आगमों में मिलते हैं तो यह सृष्टि के नियम भी है। ऐसे कितने ही नियम सृष्टि के होंगे । जैसे कोई देवता है आयुष्य पूरा करेगा तो या वह मनुष्य ही बनेगा या तिर्यचं में जाएगा ,न नरक में जा सकता न वापस देवता बन सकता। यह भी एक नियम है सृष्टि का कोई भी  नारकीय  जीव है आयुष्य पूरा करके देवगति में नहीं जा सकता वह मनुष्य ही बनेगा या तिर्यचं ही बनेगा | शास्त्र  में कौन सा जीव कहां पैदा होगा,  साधु मर कर कहां जा सकता है यह नियम शास्त्रकार ने लिखे हैं । हमें यह ध्यान देना चाहिए।
नियमों का तो हमें जितना ज्ञान हो कि हमारी दुर्गति ना हो आत्मा की दुर्गति ना हो।  मैं आज मनुष्य हूं , पर हमेशा  मनुष्य इस रूप में नहीं रहूंगा , कभी तो जीवनकाल पूरा होगा तो मैं अपने जीवन काल में ऐसा आचरण करूं, ऐसा ध्यान रखूं कि दुर्गति में ना जाऊं। शास्त्रकार ने बताया है सुगति किसकी होती है कि जिसके जीवन में तपस्या के गुण विद्यमान होते हैं, सरल है, भद्र है, कुटिलता से बचने वाला और शांति क्षमाशीलता वाला, जो संयम में रहे, परिसह विजेता है , ऐसी आत्मा,ऐसे आदमी के लिये सुगति सुलभ हो जाती है। आप लोग गृहस्थ हैं।  भले ही गृहस्थ  में रहकर भी सुगति प्राप्त की जा सकती है देव गति प्राप्त की जा सकती है |उसके लिए  ध्यातव्य है, जीवन में निर्मलता रखने का प्रयास करें, छल कपट आदि ऐसी चीजों से जीवन को बचाना चाहिए । साधु बनना सबके लिए संभव नहीं है पर ग्राहस्थ बनकर सदाचार रखें । ऐसा काम जो उसके लायक नहीं है, बेईमानी करना,  धोखाधड़ी ,इनसे बचने का प्रयास करना चाहिए। हिंसा, हत्या जैसे कार्य ना करें। आवेश, प्रतिशोध की भावना ऐसे कांडों से आदमी बचे, धर्म ध्यान साधना करता रहे तो आगे सुगति हो सकती है।

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