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भारतीय संस्कृति में संस्कारों और भावनाओं का वहुत महत्व है -मुनि श्री समता सागर जी महाराज

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मध्यप्रदेश अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

 

विदिशा(भद्दलपुर)-“भारतीय संस्कृति में संसकारों का और भावनाओं का वहुत महत्व है, वच्चों को यदि आप अच्छे संस्कार देंगे तो वही वच्चे आपके कुल को आपके नगर को और आपके प्रदेश तथा अपने भारत का नाम रोशन करते है

“उपरोक्त उदगार मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने शीतलधाम पर प्रातःकालीन ओन लाईन धर्म सभा को सम्वोधित करते हुये व्यक्त किये।उन्होने कहा कि भावनाओं पर नियंत्रण, भोजन की शुद्धता पर निर्भर है,

यदि आप शाकाहारी भोजन करते है, तो आपके अंदर की विचारधारा भी सात्विक होगी और यदि आप किसी प्राणिओं का घात करके उस अनुरूप उसे खाते हो तो आपके अंदर भी उसी अनुरुप तामसिक परिणाम ही नजर आऐंगे।

उन्होंने वर्तमान समय में कोरोना महामारी की चर्चा करते हुये कहा कि कुछ देशों ने मांसाहारी जीवों की हत्या कर उसके मांस का सेवन किया और उसका परिणाम आज सारे संसार को भुगतना पड़ रहा है, और इस वात पर संसार के कई देशों ने भी चर्चा भी की है,एवं अपने देशों में मांसाहार पर प्रतिबंध भी लगाया है।

उन्होंने विदिशा जिले से चयनित तीनों वच्चों को आशीर्वाद देते हुये कहा कि जैन परंपरा में पुरूषार्थ पर जोर दिया गया है, किसी को जल्दी सफलता मिल जाती है,तो किसी को थोडी़ देर भी लग सकती है, इसलिये जो अभी सिलेक्ट नहीं हुये है,

उनको निराश होंने की आवश्यकता नहीं है,उनको अपना पुरुषार्थ करते रहना चाहिये। एक गृहस्थ को कुलाचार, सदाचार, और श्रावकाचार तीनों का पालन करना चाहिये,तभी उसका गृहस्थ धर्म पलता है, उसी प्रकार मुनिओं के लिये भी मूलाचार के रुप में एक नियमावली दी गयी है, उनको भी इस नियमावली का पालन करना अनिवार्य है,

वह चांहे फिर उत्तरी भारत का हो या दक्षिणी भारत का हो मूलाचार में मुनिओं के लिये कोई छूट प्रदान नहीं की गई है,
उसी प्रकार श्रावकाचार में एक सदगृहस्थ को जो नियमावली दी गई है,यदि वह उन नियमों का पालन करता है, तो वह सदगृहस्थ भी इस प्रकार से कोरोना जैसे महारोगों से अपने आपका वचाव कर सकता है।

उन्होंने चार प्रकार की शुद्धिओं की चर्चा करते हुये कहा कि जैसे एक गाड़ी को चलाने के लिये ईधन की आवश्यकता होती है, उस ईधन में यदी शुद्धता न हो तो वह गाडी़ नही चल सकती

उसी प्रकार आपके शरीर रुपी यह गाड़ी भी आपके भोजन पर ही आधारित है, आप जो भोजन कर रहे है, उस भोजन से ही आपके तन और मन और वचन पर प्रभाव पड़ता है,
अशुद्ध और तामसिक भोजन करोगे तो आपका तन और मन और वचन भी उसी अनुरूप होते चले जाऐंगे और यदि आप शुद्ध और सात्विक भोजन करेंगे तो आपके विचारों में भी परिवर्तन आएगा।

उन्होंने कहा कि शास्त्रों को ज्यादा भले ही न पड़ो लेकिन जितना भी पड़ो उसे वारिकी के साथ यदि समझोगे और उस क्रिया को करोगे तो आपको भी धीरे धीरे उसमें आनंद आने लगेगा।जैसे छोटे छोटे वच्चों को जब प्रारंभ में स्कूल भेजते है, पहले पहल तो जवरन भेजना पड़ता है, लेकिन धीरे धीरे उनका मन लग जाता है,तो फिर उनको कहना नहीं पड़ता, फिर तो वह अपने आप समय पर तैयार होकर स्कूल की ओर जाने लगते है।

उसी प्रकार शास्त्रों में जो कुछ भी कहा गया है उसको पहले पहल हो सकता है, आपको समझ में न आवे लेकिन वार वार उसको आप पड़ेंगे और समझेंगे तो फिर आपका मन भी उसमें लगने लगेगा और फिर उसी अनुरुप आप चर्या करने मेंभी आनंद महसूस करेंगे।

मुनि श्री ने कहा कि संसार के प्रत्येकप्राणियों केउदर पूर्ती हेतू भोजन दिया गया है, मांसाहारी प्राणी उदर पूर्ती हेतु प्राणिओं का भक्षण करते है, उसी प्रकार शाकाहारी प्राणिओं के लिये शाकाहारी भोजन करने का शास्त्रों में निर्देश है।

उन्होंने कहा कि आज जो कोरोना महारोग फैला है, उसका मुख्य कारण पृकृति विरूद्ध इंसानों द्वारा कृत करना ही माना जा रहा है। मनुष्य यदि मांसाहार का भक्षण करेगा तो इस प्रकार के परिणाम तो सामने आऐंगे ही, जिन पशु पक्षीओं को छूने में ही आपको दोष लगता है, ऐसे जीवों का भक्षण करने के कारण ही वर्तमान समय में यह कष्ट आया है, कुछ देशों की गल्ति के परिणामों ने आज अन्य सभी शाकाहारी देशों को भी संकट में डाल दिया है।
उन्होंने खाना, भोजन और आहार पर वोलते हुये कहा कि हालांकि तीनों का अर्थ एक ही है,

लेकिन उसका भावनात्मक प्रभाव हमारे मन वचन और काया पर पड़ता है, जैसे आप किसी के यंहा वफे खाने पर गये तो वंहा पर खा तो आओगे लेकिन वंहा आपकी भावनाऐं शुद्धता के साथ नहीं जुड़ेगी। लेकिन जिधर पर आपको भोजन आमंत्रित कर सम्मान सहित खिलाया जा रहा है, तो वंहा पर आपके भोजन के साथ साथ आपके परिणाम भी शुद्ध होंगे।

उन्होंने कहा कि मांसाहारी भोजन तो कभी भोजन हो ही नहीं सकता जंहा पर किसी जीव को तड़पा तड़पा कर मारा जा रहा हो उस जीव के जैसे परिणाम मरते समय के होते है, उसका प्रभाव भी कर्म सिद्धांत के अनुसार उसे पकाकर खाने वाले जीव को भोगना ही पड़ते है।
मांसाहारी भोजन तो भोजन की श्रैणी में आ ही नहीं सकता।

जिस जीव का मांस आप भक्षण करने जा रहे है,वंहा पर आपके विचार शात्विक हो ही नहीं सकते। उन्होंने कहा कि यह कर्म सिद्धांत है,? वह क्याआपको छोड़ देगा? कोरोना का जो प्रकोप है वह किसी एक समुदाय पर नहीं है, उसी प्रकार हिंसा, झूंठ, चोरी ,कुशील के दोष और परिणाम भी किसी समुदाय विशेष को नहीं है, भले ही जीव हिंसा के परिणाम किसी और देश ने किये हों लेकिन भुगतना तो आज प्रत्येक प्राणी को ही पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि यदि आपका खान पान शुद्ध है तो आपको ज्यादा घवराने की भी कोई जरूरत नहीं, भले ही आज संसार में कोई वैक्सीन न वनी हो लेकिन यदि आप श्रावकाचार का पालन कर रहे हें तो निश्चित रहें किसी कोरोना रोग से घवडा़ने की जरुरत नहीं।

उन्होंने द्रव्य,क्षेत्र,काल,और भाव इन चार शुद्धिओं पर ध्यान आकृषित करते हुये कहा यदि आप शुद्ध भोजन करेंगे, समय पर करेंगे अचछे भाव से करेंगे तो आपके किये गये भोजन से आपके मन के भाव भी पवित्र और शुद्ध वनेंगे,

उन्होंने कहा कि मुनि महाराज आहार को निकलते है तो वह इन चारों प्रकार की शुद्धिओं का ध्यान रख कर ही आहार को ग्रहण करते है। और अपने रत्नात्रय धर्म का पालन करते है, आहार शुद्धता से ही उनके विचारों में पवित्रता सदैव वनी रहती है।

उपरोक्त जानकारी चातुर्मास कमेटी के मीडिया प्रभारी एवं शीतलधाम के प्रवक्ता अविनाश जैन ने देते हुये वताया कि लाईव प्रवचन सुनने के लिये यू टियूव पर मुनि श्री समतासागर जी के भक्त समूह को सब्क्राईव करें तथा वेल आईकान दवा कर सदस्यता ग्रहण करें, जिससे अधिक से अधिक लोग मुनि श्री की वाणी का लाभ लोगों तक पहुंच सके।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन (विदिशा) मध्यप्रदेश

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