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धर्म ही जीवात्मा की रक्षा-सुरक्षा करता है- *डाँ प्रीति सुधा*

मारवाड़ जंक्शन। रुप रजत विहार में चर्चा के दौरान *डाँ प्रीति सुधा* ने कहा जीवन एक लंबा सफर है। इस लंबे सफर में यदि धर्म को स्थान नहीं दिया,धर्म की शरण नहीं ली तो समझना चाहिए कि यह जीवन हम व्यर्थ में खो रहे हैं। क्योंकि धर्म हमें पग- पग पर गिरने से बचाता है चलते चलते कहीं गिर गए अथवा दुर्घटनाग्रस्त हो गए तो उस जख्म का उपचार संभव है परंतु यदि चरित्र में गिर गए या अपने नैतिक मूल्यों के विपरीत किसी का अहित कर बैठे तब फिर उसका उपचार असंभव है।
जीवन में जब तक धर्म को स्थान नहीं दिया फिर तो पतन निश्चित ही है।यह हमेशा याद रखें कि धर्म ही जीवात्मा की रक्षा-सुरक्षा करता है और धर्म ही संसार की वैतरणी पार कराता है। उन्होंने कहा कि* धर्म को हमारी जरूरत नहीं है बल्कि हमें धर्म की जरूरत है। संसार में जितने भी महापुरुष तीर्थकर ऋषि -महर्षि हुए हैं, उन सब ने धर्म की शरण ली है।तभी तो वे नर से नारायण,कंकर से शंकर बन पाए।धर्म व्यापक विस्तृत एवं सर्वत्र हैं और उसकी थाह इतनी गहरी व सूक्ष्म है कि उसे हम कदापि समझ नहीं पा सकते। तभी तो धर्म को परम शाश्वत सत्य का रूप कहा गया है। मनुष्य बने हो तो मनुष्य का आचरण भी करना चाहिए, जब धर्म का आश्रय लें, धर्म से रिश्ता जोड़े, धर्म का ही सच्चा सहारा है, यह संसार तो मेला है, जैसा मेला देखते समय बालक अपने पिता की उंगली पकड़ी रहता है, तुम भी धर्म रूपी पिता की उंगली पकड़कर इस संसार में विचरण करो तो सब अच्छा लगेगा। धर्म को कसकर पकड़े रहो, हर जन्म में वही साथ देगा। उन्होंने कहा कि* गिरते हुए को ऊंचा उठाने वाला धर्म ही है।
संसार में सभी सुख के संगी हैं, दुःख में सहारा धर्म ही देता है। जगत का स्वरूप नितांत स्वार्थमय है।जहाँ गुड रखा हो सैकड़ों मक्खियां आ जाती है, जहां धन दौलत ना हो वहाँ कोई पास तक नहीं फटकता। धर्म त्राण हैं, धर्म द्वीप हैं, धर्म सुखप्रद शरण हैं, धर्म गति हैं,धर्म प्रतिष्ठा हैं। ऐसे अमूल्य धर्म को कोई भाग्यवान ही अपना सकता है। धर्म ही दुर्गति में जाने से बचाता है तथा अशुभ परिणामों से सचेत कराता है। पाप क्या है और पुण्य क्या है, इसका बड़ी सहजता से ज्ञान कराता है। जब साधक यह समझ लेता है कि अमुक गलत कार्य अथवा किसी का अहित करने से मुझे पाप लगेगा। यह ज्ञान की चेतना शक्ति ही धर्म का स्वरुप हैं। व्यक्ति पाप कार्यों में तभी तक लिप्त रहता है जब तक उसे धर्म का ज्ञान नहीं रह पाता। यदि धर्म के प्रति जागरूकता बनी रहे तो फिर वह पाप व अशुभ कार्य करना तो दूर मन में सोचने से भी परहेज करेगा। धर्म में ताकत है कि वह जीवन को नारकीय से स्वर्ग और मनुष्य से महामानव तक बना सकता है।

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