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पुण्य के फल से सुख मिलता है : विराग सागर महाराज

सवांददाता सोनल जैन
भिंड। परम् पूज्य गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज ने अपने वाणी से संबोधित करते हुए कहा कि आत्मा से परमात्मा की प्राप्ति यतन साध्य है सभी तीर्थंकरों भगवन ने भी रत्नात्रय धारण  करके आत्मा की सिद्दी की है यदि शरीर को आत्मा माना जाए या फिर शरीर के नष्ट होने पर आत्मा का नष्ट माना जाए तो विचारीय फिर स्वर्ग नरक पुण्य पाप के फल को कौन भोगेगा पर ऐसा नहीं है शरीर आयु पूर्ण होने पर नष्ट होता है और आत्मा को स्व स्व कर्मानुसार अगली अगली गतीयों में जाना पड़ता है हम देखते हैं सास्वत एक तांगे वाला है उसका एक घोड़ा है वह दिन भर गाड़ी खींचकर मेहनत करता है और मान लीजिए 1000 कमाता है पर घोड़े को कितना भोजन देता है 100 का 900 उसके काम आते हैं सोचे घोड़ा गाड़ी खींचता है पर 100 का भोजन बाकी 900 क्या हुआ तो भैया नियम से घोड़े ने पूर्व भव मैं तांगेवाले से कर्ज लिया हुआ

जिसे चुकाया नहीं होगा पर आज उसे घोड़ा बनकर चुकाना पड़ रहा है अतः जब प्रत्येक व्यक्ति को अपने अपने कर्मानुसार फल मिलता है तो हम क्यों धर्म साधना त्याग व्रत नियम संयम धारण करें क्यों ना पापों से बचें व्यसनों का त्याग करें किसी प्राणी को ना सताए सबकी भलाई करें क्योंकि पाप का फल नरक तिर्यंच गति में जाकर दुख सहकर भोगना पड़ता है तथा धर्म के फल से मनुष्य देव गति की प्राप्ति होती है जहां पुनः धर्म पुण्य संचय के साधन मिलते हैं पुण्य के फल से सुख मिलता है अतः हमारा कर्तव्य है कि स्वर्ग नरक भले ना दिखे पुण्य पाप कर्म भले ना दिखे पर साक्षात उनके फल हमें दिखते हैं अतः फल है तो नियम से वृक्ष यानी कर्म भी होंगे स्वर्ग नरक भी होंगे ऐसा भगवान गुरुजनों की वाणी पर विश्वास करें व्यर्थ समय धर्म दया आदि बिना ना गवाएं और जब हम धर्म करते रहेंगे प्रभु के पथ पर चलेंगे तो यही यतन पुरुषार्थ एक दिन हमारी आत्मा को परमात्मा बना देगा। 

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