जैन प्रवचन jain pravchanजैन समाचार

अंतर्मन को रोशन करने का पर्व है पर्युषण – संत चन्द्रप्रभ


संबोधि धाम में ऑनलाइन पर्युषण पर्व प्रवचनमाला  का आयोजन  

AHINSA KRANTI NEWS


जोधपुर, 16 अगस्त। राष्ट्र-संत महोपाध्याय चन्द्रप्रभ सागर महाराज ने कहा कि पर्युषण अंतर्मन को रोशन करने का पर्व है। पर्युषण पर्व भारत की आत्मा है। जैसे सारी नदियाँ सागर में आकर विलीन हो जाती है वैसे ही सारे पर्व पर्युषण में आकर समा जाते हैं क्योंकि सारे पर्व बाहर की दुनिया को रोशन करते हैं, पर यह हमारे अंतर्मन को रोशनी से भरने के लिए आता है। यह कोई दिये जलाने का, रंग उड़ाने का, मिठाइयाँ बांटने का, लेन-देन करने का, सजने-संवरने का या मंदिरों को रोशन करने का नहीं भीतर का दीप जलाकर खुद को रोशन करने का पर्व है। यह मन को मांजने का, कषाय की होली जलाने का, कु्र रता से करुणा की ओर व दुश्मनी से मैत्री भाव की ओर बढऩे का पर्व है। यह तो जीवन की प्रयोगशाला में प्रवेश है जहाँ प्रेम, क्षमा और सरलता की साबुन लेकर मन में जम चुकी वैर-प्रतिशोध और कटुता की गंदगी को धोने के प्रयोग किए जाते हैं।


संत चन्द्रप्रभ रविवार को कायलाना रोड़ स्थित संबोधि धाम में आयोजित ऑनलाइन पर्युषण पर्व प्रवचनमाला के दूसरे दिन पर श्रद्धालु भाई-बहिनों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पयुषर्ण में तीर्थंकरों एवं महापुरुषों के जीवन चरित्र का श्रवण किया जाता है। महापुरुषों के चरित्र सुनने के लिए नहीं स्वयं के चरित्र को सुधारने के लिए होते हैं। जो मेरे गुरु, मेरे शास्त्र में सीमित हो जाता है वह कभी प्रभु तक नहीं पहुँच पाता है। शास्त्रों का निर्माण अखिल मानवजाति के लिए हुआ है। हम हर महापुरुष को व हर शास्त्र को सुनें, समझें, पढें़ व चिंतन कर अच्छी बातों को जीवन से जोडऩे की कोशिश करें।


झुकाने का नहीं, झुकने का है पर्व-संतश्री ने कहा कि सम्पूर्ण धरती पर एक मात्र पर्युषण ही ऐसा पर्व है जो हाथ मिलाने या गले लगने का नहीं, पैरों में झुककर मांफी मांगने की प्रेरणा देता है। यह झुकाने का नहीं झुकने का पर्व है। जो पर्युषण के दिनों में भी दूसरों के प्रति प्रतिशोध रखता है वह गृहस्थ कहलाने के काबिल नहीं रहता। 364 दिन भले ही बड़े छोटों को प्रणाम करवाएं, पर संवत्सरी का 1 दिन मानवजाति को संदेश देता है कि सास बहू को, पिता बेटे को, अधिकारी कर्मचारी को और बड़े छोटों को प्रणाम कर हो चुके अनुचित व्यवहार की क्षमायाचना कर ले।

व्यक्ति अन्न का त्याग भले ही न कर पाए, पर कम से कम इन दिनों में क्र ोध का त्याग करने का उपवास अवश्य करे। जो गलती करता है वह इंसान है और जो गलती पर गलती किए जाता है वह इंसान कहलाने के काबिल नहीं रहता और जो गलती होने पर क्षमा मांग लेता है वह भगवान तुल्य बन जाता है।
औरों की भूलों को भूल जाएं-संतश्री ने कहा कि औरों की भूलों को भूलने में ही हमारी भलाई है। जेब में आइना और कब्रिस्तान रखने की प्रेरणा देते हुए संतश्री ने कहा कि आइना इसलिए कि हम खुद की कमियों को देख सकें और कब्रिस्तान इसलिए कि हम दूसरों की कमियों, गलतियों, भूलों और कटू व्यवहारों को उसमें दफना सकें। जब भगवान श्रीकृष्ण शिशुपाल की 99 गलतियों को माफ कर सकते हैं और भगवान महावीर कानों में कीले ठुकवा सकते हैं तो क्या हम किसी की 9 गलतियों को माफ करने का और किसी के दो कड़वे  शब्दों को सहन करने का बड़प्पन नहीं दिखा सकते हैं। जैसे साल बीतते ही पुराना केलेण्डर फैंक देते हैं वैसेही दिन बीतते ही हमें पुरानी बातों, वैर-विरोध की गांठों को फैंक देना चाहिए।


भजन सुनाया-इस दौरान संतप्रवर ने ‘पर्व क्षमा का आया है, हम गीत क्षमा के गाएँ, हम क्षमाशील बन जाएँ। वैर भाव की कलुषकालिमा मन से दूर हटाएँ, हम क्षमाशील बन जाएँ…’ भजन सुनाया।
कल्पसूत्र आगम का महात्मय पर प्रवचन सोमवार को-अध्यक्ष सुखराज मेहता एवं महामंत्री अशोक पारख ने बताया कि कल सोमवार को सुबह 8.40 बजे पर्युषण के तीसरे दिन संत चन्द्रप्रभ ‘कल्पसूत्र आगम का महात्मय’ विषय पर संबोधित करेंगे जिसका ऑनलाइन प्रसारण फेसबुक पर किया जाएगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Close