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जिसके पास आत्म विश्वास और आत्म पुरुषार्थ है, वही जीव मोक्ष को प्राप्त कर सकता है-मुनि श्री

मध्यप्रदेश अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

विदिशा(भद्दलपुर)-कभी कभी वादल छा जाते हे,ओर हवा के जोर से वह वादल इधर उधर भी जा सकते है इस वात का ध्यान रखना उपरोक्त उदगार मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने अरिहंत विहार जैन मंदिर में प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये।

उन्होंने मनुष्य जन्म की सार्थकता को वताते हुये कहा कि  सभी को इस जन्म के रूप में एक अवसर मिला है, जीव है तो उसका संसार परिभ्रमण नये नये रूप में चलता रहता है, और यह जीव विभिन्न रुप मे परिभ्रमण करता रहता है। और इस परिभ्रमण में मनुष्य जन्म का अलग ही महत्व है। 

उन्होंने कहा कि जैसे एक किसान मौसम को पहचान कर अषाढ़ के महिने में अपनी जमीन से खरपतवार हटाकर वीज को वोता है, तो उसे उसके पुरुषार्थ का फल मिलता हें, और वह मालामाल हो जाता है, जैसे किसान के लिये अषाढ़ के माहिने का महत्व है, उसी प्रकार श्रद्धालुओं को  धर्म के क्षेत्र मेंअषाढ़ मास का विशेष महत्व है। इस काल में साधुजन एक स्थान पर रुक कर अपनी धर्म साधना करते हे, और समाज को भी इसका लाभ मिलता है।

उन्होंने समाज के द्वारा चातुर्मास के निवेदन पर कहा कि अभी तो हमारे पास विदिशा के पहुचने के संकेत थे और विदिशा में प्रवेश भी विना कोई गर्जना के शांतमय वातावरण के साथ हो गया है। आप लोगों ने भी शोसल डिस्टेंस का पालन कर एक नया इतिहास रच दिया है। विना किसी शोर शरावे के दो दो मुनिसंघों का प्रवेश इस अरहंत विहार में करा दिया।

उन्होंने चेतावनी देते हुये कहा कि ध्यान रखना कभी कभी वादल किस दिशा में वन रहे होते है, और हवा का प्रभाव से वह वादल अन्यत्र वरस जाया करते है,और कभी कभी ऐसा भी होता है कि वादल वने और विना कोई गड़गड़ाहट के वारिस शुरू हो जाती है,अभी अभी जब हम लोग विहार कर रहे थे तो देखा धूप में निकले थे और थोडी देर में वादल छाए ठंडी हवा की वयार निकली और वारिस इतनी तेज शुरू हो गई कि सम्हलने का भी मौका नहीं मिल पाता है।

चातुर्मास के संदेश में जबाब देते हुये कहा कि अभी तक तो हमारे पास विदिशा के लिये संकेत थे लेकिन ध्यान रखना भले ही आप लोग हमारे 28 साल पुराने ग्राहक है लेकिन वर्तमान समय में आपको अपनी आदतों को भी वदलना होगा,तभी आप धर्म लाभ ले पाएंगे। इसी प्रकार शोसल डिस्टेंस के साथ मुंह पर मास्क लगाकर ही आप लोगों को आना हैं।

उन्होंने कहा कि मुनि श्री कुंथुसागर जी ने आज लघुता प्रगट की उनकी इस वात पर मुनि श्री ने कहा कि प्रभुता को पाना है, तो लघु तो वनना ही होगा। उन्होंने कहा कि जब तक हम लघुता का वोध नहीं करेंगे तव तक हम धर्म के विराट स्वरुप को नहीं पा सकेंगे।

उन्होंने कहा कि व्यवहार में विनम्रता से जो झुकता है, वह ही आगे वड़ताहै। जो वृक्ष पर फल लगा करते है, उसकी डालियाँ स्वमेव झुक जाया करती है। जो वृक्ष हवा के रुख को देखकर झुक जाया करते है वही वृक्ष अपनी जड़ों को मजवूत रखते है।

उन्होंने काव्य की दो पक्तियां कहते हुये विराम लिया  “लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभू दूर चींटी ले शक्कर चली हाथी के सिर धूल” उन्होंने सूर्यग्रहण के संदर्भ में अपने विचारों को प्रगट करते हुये कहा कि आज गृहणकाल हे और,  गृहणकाल को मान्यताओं और सिद्धांतों में अपनी अपनी तरह समझते हे जैन सिद्धांत में यह प्रदूषित काल माना जाता है, जो कुछ कार्य करने के लिये वर्जित हें।

वैज्ञानिकता और व्यवहार में तथि स्वास्थय के हिसाव से यह समय उचित नहीं,हालांकि धर्म के हिसाब से हम सभी की मान्यता अलग अलग है। साधना के क्षेत्र में तो सभी काल वरावर होते है, उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देते हुये कहा कि सावधानी पूर्वक मास्क लगाकर शोसल डिस्टेंस के साथ यदि आप लोग आऐंगे तो आपको समय पर धर्म लाभ मिलता रहेगा।

इस अवसर पर मुनि श्री कुंथुसागर जी महाराज ने कहा कि संसार की अनेक भव्य आत्मा अपना कल्याण करना चाहता है, जिसके पास आत्म विश्वास और आत्म पुरुषार्थ है, वही जीव मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। उन्होंने कहा कि “सिद्धांत के विना निश्चय नहीं और निश्चय के विना समता नहीं, और उस समता के साथ यह छोटासा जीव कुंथु भी है।

उन्होंने कहा कि एक गृहस्थ के जीवन में संतोष और एक साधक के जीवन में साधना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जो गृहस्थ संतोष को धारण कर लेता हे, वह गृहस्थ ही सही मायने में गृहस्थ है। मुनि श्री ने संतोष और समता में अंतर स्पस्ट करते हुये कहा कि यदि आप संतोषी प्राणी है, तो हमेशा प्रसन्नता महसूस करते है।और समता जिसके अंदर होती है, वह दुःख में सुख में हमेशा अपने आपको प्रसन्न महसुस करते है।

उन्होंने कहा कि विदिशा जिसका नाम भद्दिलपुर हे एवं भद्र प्राणी रहते है उस भद्दिलपुर में भगवान शीतलनाथ विराजमान रहते है, जंहा पर भगवान श्री शीतलनाथ स्वामी के चार चार कल्याणक हुये है, ऐसे तीर्थ पर आचार्य भगवन् का हमेशा आशीर्वाद रहा है। मंच पर ऐलक श्री निश्चय सागर जी महाराज एवं ऐलक श्री सिद्धांत सागर जी महाराज विराजमान थे।

प्रवक्ता अविनाश जैन ने वताया कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान श्री पारसनाथ स्वामी के एवं आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के चित्र के समक्ष पर दीप प्रजजवलन एवं मंगलाचरण के साथ हुआ।

प्रतिदिन प्रातःकालीन धर्म देशना का समय ८:१५ का रहेगा एवं सांयकाल ६ वजे गुरू भक्ती होगी। सभी महानुभावों से निवेदन हे कि समय से १५ मिनटपूर्व पधारें एवं वाहर सावुन से हाथ एवं पैरों को धोकर तथा शोसल डिस्टेंस का पालन करते हुये मास्क लगा कर ही अपना स्थान ग्रहण करें।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन (विदिशा) मध्यप्रदेश

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