पूर्ण रूप से भोगना पड़ता है नरक आयुष्य : आचार्य महाश्रमण

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AHINSA KRANTI NEWS

हैदराबाद। तीर्थंकर के प्रतिनिधि तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी ने धर्मसभा को रायपसेणियं आगम की व्याख्या करते हुए कहा- राजा प्रदेशी नास्तिकवाद की विचारधारा को मानने वाला था। जब राजा प्रदेशी मृगवन उधान में पहुंचा और देखा कि कुछ मुनि लोग वहां बड़ी बुलंद व तेज आवाज में प्रवचन कर रहे हैं तो उसे लगा कि ये बोलने वाले और सुनने वाले सभी मूढ़ हैं, अज्ञानी हैं, अपंडित है। चित्त सारथी को पूछा ये है कौन? इतना जोर से बोलता है, यह क्या खाता है, यह लगता तो दीप्तिमान शरीर वाला है। चित्त बोला अन्नदाता यह आदमी है और अनाज ही खाता है।

राजा ने चित्त से पूछा मुझे इस आदमी के पास जाना चाहिए क्या, यह मिलने लायक है क्या? चित ने कहा कि हां आप जरूर जाएं मालिक, वह आपसे मिलने लायक आदमी हैं। राजा केशी मुनि के पास गया और पूछा आप अनाज खाने वाले है क्या। केशी मुनि ने कहा की तुम न विनय करते हो न ही तुममें शिष्टाचार है। आते ही उसे थोड़ा उलाहना सा दे दिया। केशी मुनि ने उसके मन में आये विचारों को भी बता दिया तो राजा समझ गया कि ये है तो कोई विशेष आदमी इन्होंने तो मेरे मन की बात जान ली। राजा ने मुनि से पूछा भंते आपके पास कौनसा ज्ञान है जिससे आपने मेरे मन की बात को जान लिया। केशी ने कहा मेरे पास पांच ज्ञानों में से चार छाद्मस्तिक ज्ञान है मति ज्ञान, श्रुत ज्ञान, अवधि ज्ञान और मन:पर्यव ज्ञान। पांचवा ज्ञान केवलज्ञान तो अरिहंतो के पास होता है। इन्हीं ज्ञान से मेने तुम्हारे मन की बात जान ली। अब राजा प्रदेशी के यह पूछने पर कि मैं यहां बैठ जाऊं क्या तो केशी मुनि ने निरवद्य भाषा का प्रयोग करते हुए कहा– यह तुम्हारा उद्यान है, तुम जानो। राजा बैठ गया व मूल आस्तिकवाद और नास्तिकवाद की चर्चा प्रारंभ हुई।

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शरीर अलग और आत्मा अलग यह आस्तिकवाद और आत्मा और शरीर एक यह नास्तिकवाद का सिद्धांत है। राजा बोला आप की मान्यता है कि शरीर अलग है और आत्मा अलग है तो इसके साथ परलोक कि बात भी जुड़ी हुई होगी। तब तो मेरे दादा जो बहुत अधार्मिक व निष्ठुर थे, आपके सिद्धांत के अनुसार तो वे नरक में ही गये होंगे। वे यदि आकर कह दें कि मैं नरक के दुःख भोग रहा हूं तो मैं आपकी बात मान लूंगा और अगर वे आकर नहीं बताते है तो मैं आपकी बात नहीं मानूंगा। कुमारश्रमण केशी ने समझाते हुए कहा तुम्हारी रानी सूर्यकांता के साथ कोई गलत व्यवहार करे तो तुम क्या करोगे?

राजा ने कहा मैं उसे तुरंत मार डालूंगा व स्वजनों से मिलने का भी समय नहीं दूंगा। केशी मुनि ने कहा की वही स्थिति तुम्हारे दादा यानि नारकीय जीवों की होती है। वे चार कारण अपनी वेदना, नरक के कर्मों का बंध, आयुष्य बंध व नरकपालकों के आज्ञा न देने के कारण चाहते हुए भी वे मनुष्य लोक में नहीं आ सकते। उन्हे अपने कर्मो को पूर्ण भोगना पड़ता है। पूज्य गुरुदेव ने श्री नवरतन मणोत व श्रीमती अमिता मणोत को सजोड़े आठ की तपस्या का प्रत्याख्यान करवाया। सुश्री भाविका मणोत ने भी चार की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। अभिवंदना के क्रम में श्री अशोक संचेती, श्री चैनरूप डागा, श्री मनीष पटावरी, सुश्री वैशाली सुराणा, सुश्री आस्था छाजेड़ ने अपनी भावाभिव्यक्ती दी।

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