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संवत्सरी महापर्व के अवसर पर पूज्य प्रवर ने मन की गांठें खोलने के लिए किया प्रेरित

अहिंसा क्रांति / राजेन्द्र बोथरा


हैदराबाद। तीर्थंकर के प्रतिनिधि, अनंत अनंत आस्था के केंद्र, अहिंसा यात्रा प्रणेता,  महातपस्वी, महामनस्वी परम पावन आचार्य श्री महाश्रमण जी ने संवत्सरी महापर्व के इस पुनीत अवसर पर धर्मसंघ को मंगल उद्बोधन देते हुए कहा कि आर्हत वांग्मय में कहा गया है दुनिया में जो दान दिए जाते हैं उनमें सबसे बड़ा दान कौन सा है। शास्त्र में कहा गया है दानों में श्रेष्ठ दान है प्राणियों को अपनी ओर से अभय दे देना। अभय दान वही दे सकता है जो प्राणियों की हिंसा का परित्याग कर देता है, अहिंसा का पालन करता है। अहिंसा की साधना बहुत ऊंची साधना है। गृहस्थ लोग पूर्ण रूप से अहिंसा का पालन कर सके तो अच्छा है नहीं तो आंशिक रूप में भी अहिंसा का पालन कर सकते हैं। दुनिया में शाकाहार व मांसाहार दो प्रकार के भोजन होते हैं। जैनत्व को मानने वाले ध्यान रखें कि मांसाहार उनके मुंह को स्पर्श ना कर पाए। दवा में भी नॉनवेज का मिश्रण है तो उस से बचें, उसका विकल्प खोज कर प्रयोग करें। एक बच्चे के मन में भी अगर भावना हो, ठान ले कि मुझे नॉनवेज नहीं खाना है तो वह भी इसका अच्छे से पालन कर सकता है  हमें बच्चों को अच्छे संस्कार देने चाहिए। हम तो जैन हैं अजैन भी हो तो अच्छी बात, सच्ची बात पर ध्यान देना चाहिए। हमारे मुख मंदिर से मदिरापान नहीं हों। न हमें पीना, न दूसरों को पिलाना, इसका विवेक रखें, नशे से हम मुक्त रहे। नशे के कारण से पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक मुसीबतें पैदा हो सकती है, आत्मा भी दूषित हो सकती है। जैन तेरापंथ समाज के सभी लोगों को नशा मुक्ति पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अहिंसा भी नशा मुक्ति से जुड़ी हुई है नशा का परित्याग करें। रात्रि भोजन त्याग करना भी संयम की साधना है। साधु साध्वीयों के तो जीवन भर रात्रि भोजन का त्याग होता है, गृहस्थ लोग भी रात्रि भोजन त्याग करने का प्रयास करें। जिस सत्य से हिंसा हो उस से भी बचना चाहिए। सत्य के साथ अहिंसा हो तो मानो भाई-बहन की जोड़ी बन जाए।हमें सावध सत्य बोलना चाहिए।
पूज्य प्रवर ने परम आराध्य भगवान महावीर की अध्यात्म के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए फरमाया कि दुनिया में भगवान महावीर उत्तम पुरुष थे। महावीर की अध्यात्म यात्रा का प्रसंग चल रहा है। आज इसके समापन का दिवस है। भगवान महावीर ने परिवार को छोड़ दीक्षा ली परिषह को सहने का समय आ गया ,परिषहों को सहते सहते भगवान का साधना जीवन आगे बढ़ रहा था, देवों ने भगवान से कहां कि इस तरह आपको यहां पर बहुत कष्ट झेलने पड़ेंगे व यहां के लोगों की भाषा भी अच्छी नहीं है, मुझे आप अपनी सेवा करने का मौका दें। लेकिन महावीर ने उन्हें मना कर दिया। भाषा अपनी-अपनी होती है भाषा में आवेश, आक्रोश नहीं होना चाहिए, मिठास होना चाहिए। प्रेम की भाषा में किसी को तू भी बोले तो अच्छी लगती है। भाषा में भक्ति व मन में सम्मान होना चाहिए। भगवान बोले मैं कष्ट सहन कर लूंगा परन्तु दूसरों के सहारे नहीं रहूंगा। भगवान ने अपने बल से, पुरुषार्थ से परिषहों  को सहन किया। भगवान की साधना पूर्ण हुई, भगवान मोक्ष पधार गए। आप गृहस्थ लोग भी साधना करें,  भक्ति करें, श्रद्धा रखें, शक्ति लेने का प्रयास करें व मोक्ष की भावना रखें।गुरुदेव ने संवत्सरी के इस विशेष पर्व के बारे में बताते हुए कहा कि संवत्सरी पर्व एक महान अतिआध्यात्मिक पर्व होता है‌। यह खाने का नहीं भूखे रहने का पर्व है। बच्चे भी आज न खाने का प्रयास करते हैं। हमारे बाल मुनि भी आज चोविहार उपवास करते हैं। यह आत्मा की पोथी को पढ़ने का दिन है, क्षमा का पर्व है। आज जो प्रतिक्रमण होता है वह वर्ष भर में सबसे बड़ा होता है। इसमें 40 लोगस्स का ध्यान किया जाता है।

यह एक शुद्धि की बात है, क्षमा की बात है। आज व कल दोनों दिन क्षमायाचना की जाती है। वाणी से खमतखामना करना अच्छा है परंतु वह वाणी तक ही सीमित न रहे, मन की गांठें खोलने वाला बने। खामेमि सव्व जिवे, सव्वे जीवा खमंतु में, मित्ति में सव्व भूएषु वेरं मज्झ न केणई। यह श्लोक क्षमा की प्रेरणा देने वाला है। आज का पर्व उपवास करने का है किसी से शारीरिक व्याधि के कारण न हो सके तो जितने समय तक हो सके करना चाहिए। उपवास के साथ पौषध भी हो तो मानो सोने पर सुहागा हो सकता है। अष्ट प्रहरी, छह प्रहरी, चार प्रहरी पौषध करें। यह पौषध मानो औषध है। आत्मा के पाप को साफ करने के लिए पौषध एक अंश तक औषध का कार्य करता है। पौषध के भी अनेक नियम व व्यवस्थाएं होती है उन पर ध्यान दें व पालन करें, वस्त्रों का प्रतिलेखन करें। हिंसा से बचें। मुखवस्त्रिका सामायिक व पौषध में रहना विधि की बात है।

आज तो विवशता के कारण घर-घर में प्रत्येक जन मास्क के रूप में मुखवस्त्रिका लगा रहे हैं। सामायिक व पौषध के नियमों की जानकारी दी। पूज्य प्रवर ने आज के दिन तपस्या का विशेष महत्व बताते हुए जिनके तपस्या है उनको प्रत्याखान करवाया, वह मंगल पाठ सुनाया।पूज्य प्रवर ने आगे फरमाया कि पूरे वर्ष के धार्मिक पर्वों में यह एक महत्वपूर्ण पर्व है। आज जैन जगत का प्रमुख पर्व संवत्सरी है। पूरे संघ में तप का रंग छाया हुआ है और धर्म की जड़ हरी है। लाखों लोग आज उपवास, पौषध कर रहे है। जैन जगत में नमस्कार महामंत्र का जाप करने के संस्कार रहने चाहिए। यह नवकार मंत्र जैन शासन की एक पहचान है। आज के दिन अागमों का स्वाध्याय साधु, साध्वीयों व गृहस्थों को करना चाहिए। जैन विद्या को पढ़ने पढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। जैन शासन में जैन विद्या का विशाल भंडार है।पर्यूषण पर्व के इस महान संवत्सरी पर्व पर आगे फरमाते हुए गुरुदेव ने कहा कि जैन शासन के अनेक संप्रदायों में एक संप्रदाय है जैन श्वेतांबर तेरापंथ।तेरापंथ धर्मसंघ की आचार्य परंपरा में पूर्ववर्ती दस आचार्यों, आचार्य श्री भीखण जी, आचार्य श्री भारमल जी, आचार्य श्री रायचंद जी, आचार्य श्री जीतमल जी,आचार्य श्री मघवागणी, आचार्य श्री माणकगणी, आचार्य श्री डालगणी, आचार्य श्री कालुगणी, आचार्य श्री तुलसी, आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के जीवन का संक्षिप्त परिचय बताया।मुख्य नियोजिका साध्वी श्री विश्रुतविभा जी व मुख्य मुनि महावीर कुमार जी ने आचार्य श्री महाश्रमण जी के जीवन की विशेषताओं का श्रावक समाज को ज्ञान करवाया ।

इससे पूर्व कार्यक्रम में साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा जी ने आज के इस संवत्सरी महापर्व पर बताया कि यह पर्व आत्मा में रहने का, आत्म लोचन का पर्व है। आत्मा में रहने वाले का जीवन त्रेकालिक होता है और शरीर में रहने वाले का जीवन अल्पकालिक होता है। हमें थोड़े के लिए ज्यादा को नहीं खोना चाहिए। पर्युषण महापर्व पर हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हम आत्मा के बारे में सोचें व आत्मा के आसपास रहे। मुख्य मुनि महावीर कुमार जी ने फरमाया कि संवत्सरी जैन शासन का आध्यात्मिक चेतना जागृत करने का पर्व है यह लौकिक नहीं, अलौकिक पर्व है। आज का दिन आत्मचिंतन करने का, आगम वाणी सुनने का है। इस पर्व पर हम कर्मों की वृत्ति से दूर रहें वह मैत्री भाव रखें। पर्युषण पर्व भीतर के कचरे को साफ करने का पर्व है। यह आत्मा को सजाने का पर्व है। साध्वीवर्या सम्बुद्ध यशा जी ने आज के इस पावन दिवस पर गीतिका के माध्यम से संदेश दिया   कि हमारा मन निर्मल रहे, काया निर्मल रहे। कटुता के व्यवहार को भूलाकर जीवन को सरस बनाने का यह सुंदर अवसर है। मुनि श्री दिनेश कुमार जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह जो महापर्व आया है वह लाभ कमाने का पर्व है, जीवन के खाते को मिलाने का पर्व है, क्षमा का पर्व है। क्षमा से क्षमा बढ़ती है हम कषायों को कमजोर करते रहे तो साधना बढ़ती जाएगी, मन शांत हो जाएगा।

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