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प्रभु की भक्ती लघु वन कर ही की जा सकती है-मुनि श्री समता सागर जी महाराज

मध्यप्रदेश अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन
विदिशा(भद्दलपुर) – राग के चहरे तो अलग अलग हो सकते है, लेकिन वीतरागता का चहरा कभी अलग नहीं हो सकता अन्य स्वरुप आर्टिफिशियल वन सकते है, लेकिन जिन मुद्रा कभी आर्टिफिशियल  नहीं हो सकती वहुरूपीया भी विभिन्न रूपों से धारण कर लोगों को रिझा सकता है, लेकिन वह भी मुनि मुद्रा को धारण नहीं कर सकता जिन्होंने एक वार भी इस स्वरुप को धारण किया है, फिर वह दूसरा रुप धारण ही नहीं कर सके उपरोक्त उदगार मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने  जिज्ञासुओं के समाधान के साथ “सागर वूंद समाऐ” कृति से सार वतलाते हुये व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि शास्त्रों में वृह्मगुलाल वहरुपिया का उदाहरण  सामने आता है, कहते है कि वह वहरूपिया अनेक रूप हू वहू धारण कर लेता था, लेकिन एक वार उससे राजा ने जिन मुद्रा धारण कर मुनि रुप धारण करने को कहा तो उसने राजन से छै माह का समय मांगा और कठिन साधना का अभ्यास कर मुनि मुद्रा को धारण किया, यह उनका अंतिम रुप था इसके वाद उन्होंने कभी इस रुप का परिवर्तन ही नहीं किया।
उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ती में जैसे “किसी कागज के पृष्ठ पर गोंद लग जाए और उसे दूसरे कागज पे चिपकाओ तो वह कागज एक मेव हो जाता है, उसी प्रकार भक्त को भक्ती रुपी गोंद यदि एक वार लग जाऐ तो भक्त और भगवान को एक होंने में देर नहीं लगती”
उन्होंने कहा कि पंच परमेष्ठी की भक्ती करने से चित्त को शांती मिलती है, अशांत मन भी शांत हो जाता है, यदि कोई घनघोर जंगल में भी भटक जाऐ तो प्रभु का स्मरण आपको सही रास्ता दिखा देगा। उन्होंने कहा कि प्रथमानुयोग के ग्रन्थों मेंअनेक उदाहरण सामने आऐ है, अशुभ कर्म के उदय से महलों में रहने वालों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ा है।
उन्होंने महासति सीता, अंजना, सुदर्शन सेठ, श्री पाल आदि अनेक उदाहरण देते हुये कहा कि, धर्म के प्रति श्रद्धा और विश्वास ने उनको रास्ता दिखाया और अपनी इस पर्याय को सार्थक किया।
मुनि श्री ने कहा आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज जिनवाणी के प्रति वहूत वहुमान करते है, एवं संघ के लिये समय निकाल कर पड़ाते है। मुनि श्री ने कहा कि प्रभु की भक्ती लघु वन कर ही की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि वड़े वड़े राजा और मुकुटधर राजा भी जब भगवान के चरणों में पहुंचते है, तो वह विनम्र और निर्मल परिणामों के साथ अपने मुकुट को  उतार कर ही पहुंचते है।
उन्होंने कहा कि अहंकारी धर्म के मर्म को समझ ही नहीं सकता प्रभु की भक्ती लघुता के साथ ही हो सकती है, आचार्य श्री निजानुभव शतक में कहते है कि जो मानते स्वं को सवसे वड़े है, वो धर्म से वहूत दूर खड़े है।
उन्होंने कहा कि लघुता विनम्रता में छल कपट नहीं होंना चाहिये मन की सरलता के साथ जिन्होंने धर्म को स्वीकार किया है, वही धर्म के मर्म को समझ सकते है।
उन्होंने कहा कि भले ही थोड़ा भगवान स्तवन करना लेकिन अपने मन में सहजता और सरलता रखना चाहिये। मंत्र के प्रति यदि आप श्रद्धा रखोगे तो आपके सभी कार्य वनते चले जाऐंगे। उपरोक्त जानकारी देते हुये मुनिसंघ के प्रवक्ता अविनाश जैन ने दी।
~ब्यूरो चीफ देवांश जैन (विदिशा) मध्यप्रदेश
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