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भारत के पास सोने की चिड़िया के रूप में मूर्तिकला, सिद्ध कला और अपार वैभव था

 

मध्यप्रदेश अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

विदिशा(भद्दलपुर) – भारत को सोने की चिड़िया यूं ही नही कहा जाता था विश्वस्तरीय धरोहरों के रुप में भारत के पास न केवल अपार वैभव था वल्कि मूर्तीकला, सिद्धकला जैसी अनेक कलाऐं थी जिसे विदेशी आकृमणकारी लूट कर अपने देश ले गये, भारत की वह संपदा ब्रिटिश म्यूजियम में धरोहर के रुप में आज भी मौजूद है।
उपरोक्त उदगार मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने भारत का इतिहास पूर्वाध विषय पर अपने उदगार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि जैसे “लोकसभा और विधानसभा में संसदीय कार्य मंत्री होते है, उनको उसकी संरचना करना पड़ती है, उसी प्रकार तीरंथकरों के समवसरण में गणधरों की प्रधानता होती है,
उनकी नियुक्ति नियोग पूर्वक होती है, वह १२ सभाओं का संचालन कर जन साधारण एवं समस्त प्रकार के जीवों को जो तीथंकरों की वाणी नहीं समझ सकते उसको उसकी  उसकी भाषा में प्रसारित करते है। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर के समवसरण में उनके गणधर के रुप में गौतम गणधर स्वामी थे, उनके निर्वाण के पश्चात उस वाणी को प्रसारित किया, जो कि वर्तमान में जिनवाणी के रुप में आज मौजूद है।
उन्होंने इतिहास को वताते हुये कहा कार्तिक वदी अमावस्या को भगवान महावीर का निर्वाण ७२ वर्ष की अवस्था में प्रातःकालीन वेला में विहार राज्य के पावापुरी में हुआ, उनके वियोग में गौतम गणधर स्वामी साधना में लीन हो गये उसी दिवस सांयकालीन वेला में उनको भी केवल्यज्ञान की प्राप्ति हो गई, उसी क्रम में प्रातःकाल दीपावली पर्व के रुप में भगवान महावीर निर्वाण महोत्सव एवं सांयकालीन वेला में गौतम गणधर स्वामी को केवल्यज्ञान ज्योति प्रकट हुई, इस खुशी में राजा एवं प्रजा जनों ने दीपमाला पर्व को मनाया।
उन्होंने भारत का राजनैतिक इतिहास वताते हुये कहा कि भगवान महावीर के निर्वाण के पश्चात राज्य की परंपराओं का कथन करते हुये मुनि श्री ने कहा कि उक्त समय  विहार राज्य के मगध देश में पाटलीपुत्र राजधानी थी जिसके राजा श्रैणिक जो कि शिशु नागवंशी सम्राट थे,उनकी रानी चैलना जो कि जैन धर्म की उपासक थी।
उसके पश्चात उनके पुत्र आजाद शत्रु तत्पश्चात उदयवंश, उसके वाद नंदवंश, का सामराज्य आया तदुउपरांत चंद्रगुप्त मौर्य एवं उनके पुत्र बिन्दुसार तत्पश्चात सम्राट अशोक एवं उनके चार उत्तराधिकारी और हुये एवं अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ को उनके ही सैनापती पुष्यमित्र ने मारकर उनके सिंहासन पर कव्जा कर लिया।
 इसके वाद “पुष्यमित्र” को पश्चिम से मनीन्द्र एवं दक्षिण से खारवेल राजाओं ने घेर कर शुगवंश को समाप्त किया। ईशा के पश्चात चौथी शताब्दी  में दक्षिण पंथी राजाओं ने गुप्तवंश की नीव डाली।
मुनि श्री ने भारत के राजनैतिक इतिहास को आगे वड़ाते हुये कहा कि अंतिम सम्राट के रुप में चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया गया है, जिन्होंने इस राज्य कार्य को वहूत लम्वे समय तक सम्हाला। विश्वस्तरीय धरोहरों के रुप में भारत के पास जो अपार वैभव था, लेकिन वह अब हमारा नही है।
उन्होंने कहा कि दुनिया में ऐसा कोई  अनुसंधान केन्द्र नहीं जिसमें भारतीय साहित्य के साथ जैन साहित्य न हो ,उन्होंने कहा कि जैन आचार्यौ ने आपको इतना गणित दिया है कि आपको कंही भटकने की जरूरत ही नहीं है, विपुल भंडार है, आवश्यकता है उसे पड़ने और समझने की यदि हमारे तुम्हारे दिमाग उसमें नहीं लगेंगे तो इन ग्रन्थों में दीमक लग जाएगी।
उन्होंने कहा कि इस चातुर्मास में आपको  पौराणिक कथाओं के माध्यम से महापुरुषों की कथाएँ पड़ने से जंहा इतिहास की जानकारी मिलती है, वंही हमारे अंदर चारित्र की वृद्धि होती है। उन्होंने कहा कि करुणानुयोग हमें चारों लोकों की जानकारी देता है, वंही चरणानुयोग श्रावको एवं मुनिओं का संविधान है, कैसे चलें कितना चलें इसकी प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि चारों अनुयोगों में जीव दया की ही वात कही गई है।
 इस अवसर पर ऐलकश्री निश्चयसागर जी महाराज भी विराजमान थे।चातुर्मास कमेटी के मीडिया प्रभारी अविनाश जैन विदिशा ने वताया वर्तमान समय में कोरोना महामारी का प्रकोप के वड़ने से शासकीय आदेशानुसार प्रातःकालीन धर्म सभा जो कि८:४५ से ९:४५ तक चलती थी वह आगामी समय के लिये अभी निरस्त कर दी गयी है।
उसके स्थान पर जिनवाणी चैनल के माध्यम से सांयकाल 5:20 पर विदिशा नगर में चल रहे मुनि श्री समता सागर जी महाराज के “सागर वूंद समाए” प्रवचन माला का स्वाध्याय आप अपने घर पर वैठ कर करें।
~ब्यूरो चीफ देवांश जैन (विदिशा) मध्यप्रदेश
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