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आयुष्य का कोई भरोसा नहीं, मृत्यु निश्चित है: आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS


हैदराबाद। तेरापंथ धर्मसंघ के ग्याहरवें अनुशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, युग पुरुष, परमपूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी ने प्रेरणा देते हुए फरमाया कि ठाणं आगम के सातवें स्थान में सात चीजों का वर्णन चल रहा है। इसके दस स्थान है और सभी संख्या के अनुसार चलते हैं। इसी सन्दर्भ में यहाँ तीन प्रकार के जीवों के आयुष्य को उल्लेखित किया गया है। 1.बादर अपकायिक जीवों की उत्कृष्ट  स्थिति सात हजार वषों की बतलाई गई है। पानी को भी सजीव माना गया है। अपकाय सूक्ष्म भी होता है बादर भी होता है। 2.तीसरी नरक के बालुकाप्रभा के नारकीय जीवों का उत्कृष्ट आयुष्य सात सागरोपम का बतलाया गया है।

3. पंकप्रभा नामक चौथी नरक के जीवों की जघन्य काल स्थिति सात सागरोपम के आयुष्य की होती है। यह एक आयुष्य की बात शास्त्रकार ने बताई है। अलग अलग वर्गो के जीवों का आयुष्य का अलग अलग नियम होता है। आयुष्य कालचक्र से भी प्रभावित व परिवर्तित होता रहता है। आदमी का आयुष्य यौगलिक काल में बहुत लंबा यानि तीन पल्योपम का होता था। ह्रास हुआ और वर्तमान में तो सौ – सवा सौ वर्ष का करीब करीब मान ले, यह आयुष्य की स्थिति है। वर्तमान में आकस्मिक रूप में भी मृत्यु हो सकती है। मृत्यु का होना तो निश्चित है पर कब होना यह अनिश्चित है। ज्योतिषी भी अपने अपने हिसाब से बतलाते है पर उनकी हर भविष्यवाणी सही ही हो ऐसा भी नहीं होता। उस पर अति विश्वास भी करना कभी कभी अच्छा नहीं होता। हमारे धर्मसंघ में छ्ठे आचार्य परमपूज्य श्री माणकगणी का ज्योतिष पर काफी भरोसा था।

वे युवावस्था में थे उस समय वे एक बार बीमार हो गए तो संतो ने उनसे निवेदन किया कि आप उत्तराधिकारी की घोषणा कर दो। मानकगणी ने उन्हें कहा अभी तो में युवा हूं अभी बहुत आयुष्य बाकी है, इतनी जल्दी उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं करूंगा। मानकगणी की ज्योतिष गणना की काफी बातें मिल भी गई थी लेकिन आयुष्य के बारे में बात सही नहीं हो सकी। इसी विश्वास से उन्होंने अपने उत्तराधिकारी की भी घोषणा नहीं की। वे उत्तराधिकारी की नियुक्ति किए बिना ही चले गए। आयुष्य का भरोसा नहीं किया जा सकता।


आचार्यवर ने आगे प्रेरणा देते हुए कहा कि वर्तमान में तो आयुष्य का भरोसा सोच समझकर ही करना चाहिए या नहीं करना चाहिए। हमें अपना आवश्यक करणीय धार्मिक कार्य है वो समय पर कर लेना चाहिए। आयुष्य की स्थिति जो बताई गई है कि नारकीय जीवों को तो फिर भी ऐसी अकाल मृत्यु जैसी बात ना हो पर हम जो मनुष्य वर्तमान के है उनकी स्थिति अलग है। हमें जागरूक रहकर के अध्यात्म के पथ पर, धर्म के पथ पर आगे बढ़ने में पुरुषार्थ करते रहना चाहिए।

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