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गुरु के चरण नहीं उनके आचरण, को छुए-मुनि श्री समता सागर

 आचार्य श्री का 53 वा दीक्षा दिवस मनाया

मध्यप्रदेश अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

विदिशा(भद्दलपुर)-संयम के इस पर्व पर सभी लोगों को कोई न कोई नियम अवश्य लैना चाहिए वर्तमान समय के इस कैरोना काल में जैन भारतीय परंपरा को दुनिया ने स्वीकार किया है, खान पान में शुद्धि रखना , वस्त्रों को वदल कर अपने आपको सैनेट्राईज रखना, आपस में सावधानी रख थोडी़ दूरी वनाकर वैठना और सार्वजनिक स्थल या वातचीत करते समय माक्स लगाकर वात करना।

गुरु के चरण नही उनके आचरणों को छुऐं “भक्ती तो ठीक है भक्ती को विवेक की डोर से वांधकर रखना चाहिए” भक्ती में यदि विवेक नहीं हो तो वह भक्ती अंध भक्ती में परिवर्तित हो जाती है, और इस प्रकार की अंधभक्ति उचित नहीं। उपरोक्त उदगार मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर में आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के 53 वे दीक्षा दिवस पर व्यक्त किये।

उन्होंने कहा कि आज का दिन दि. जैन परंपरा के लिये अतयंत महत्वपूर्ण दिन है, तीर्थंकरों की यह परंपरा अंतिम तीर्थंकर महावीर भगवान की परंपरा से प्रभावित उनके पश्चात आचार्य प्रवर कुंदकुंदस्वामी एवं उन्नीसवीं वीसवी सताव्दी के वड़े आचार्य  श्री शांतिसागर जी महाराज ने दिगंबर रूप धारण करके पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण चारों दिशाओं में विहार करके इस आचार्य परम्परा को जीवंत रख आगे वड़ाया। उसके वाद अनेक आचार्य और हुये एवं उसी परंपरा में आचार्य ज्ञान सागर जी भी हुये है।

मुनि श्री ने कहा कि आज का विषय गुरुवर आचार्य श्री की दीक्षा से जुड़ा हुआ है।मुनि श्री ने कहा कि दीक्षा अपने आप में जीवन का टर्निंग पाइंट होती है, दीक्षा सहज नहीं होती है, दीक्षा समारोह भी नहीं है, समारोह तो वह लोग वना लेते है जो दीक्षा नही लेते है पर दीक्षा की अनुमोदना करते है कि हमें भी दीक्षा मिले।

मुनि श्री ने कहा कि एक सज्जन जो कि उम्र के अंतिम पड़ाव में थे उनकी दीक्षा की भावना हुई  उन्होंने आचार्य श्री से कहा कि कोई छोटी मौटी दीक्षा दे दो तो आचार्य श्री ने कहा कि सवसे छोटी दीक्षा दे दो लेकिन उसमें हमें एक छूट यह कि हमें दौनों टाईम भोजन एवं आने जाने के लिये वाहन की छुट हो तो आचार्य श्री ने कहा कि दीक्षा तो दीक्षा ही होती है, इसमें एक टाईम ही भोजन मिल जाए यह जरुरी नही आपतो एक काम करो दीक्षा के स्थान पर एक सद गृहस्थ के रुप में अपने घर पर रहो और अभ्यास करै नियम का पालन करो। दि. जैन परंपरा में दो वार का भोजन संभव ही नहीं है। मुनि श्री ने कहा कि जब एक ही वार का भोजन पक्का नहीं तो दो वार की तो कोई चर्चा की शास्त्रों में परंपरा ही नहीं।

मुनि श्री ने कहा कि गुरुदेव आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज की दीक्षा हुई, दीक्षा दैनै वाले वृद्ध साधक थे जिसकी उम्र 80 वर्ष थी और वह  युवा 22 वर्ष के ब्रह्मचारी युवा को सीधे मुनि दीक्षा दे रहे है। मुनि श्री ने कहा कि जितनी आवशक्ता भगवान महावीर को इन्द्र भूती गौतम को थी, तो इन्द्र भूतीको भी उतनी ही जरूरत भगवान महावीर की थी उसी प्रकार आचार्य ज्ञान सागर जी जो कि वृद्ध हो चुके थे एवं उनको अपनी विरासत सोंपने के लिये एक शिष्य की आवशक्ता थी। ब्र.    विद्याधर को भी आचार्य श्री ज्ञान सागर जी की जरुरत थी। 

मुनि श्री ने कहा कि इस अषाड़ शुक्ल पंचमी को ज्योतिष शास्त्र में ऋषी पंचमी भी कहा जाता है। घाट पुराने है, संद्रभ पुराने है,  नई नई सीडियां लगा दी जाती है। सीडि़या लगाने वालों की अपनी भाषा होती है, अपनी भावना होती है, पर घाट तो वही है। गुरू ज्ञान सागर जी जो कि आध्यात्मिक संस्कृत के साधक रहे है

उन्होंने कहा कि धन्य है वह अजमेर नगरी और धन्य है वंहा के श्रावक श्राविका,आचार्य श्री ज्ञान सागर जी  अत्यंत गंभीर साधक संस्कृत के विद्वान रहे है। उन्होंने कहा कि ऐलक श्री एवं सुधी वक्ताओं ने आचार्य श्री के जीवन पर प्रकाश डाला। मुनि श्री ने कहा कि जिस दिन तुमने गुरु का स्मरण कर लिया वह दिन ही तुम्हारा दीक्षा का दिवस है।

मुनि श्री ने कहा कि आपने वहूत सारे नियम संयम धारण किये हे यंहा तक कि भावुकता में लिये गये उन नियमों का सही से पालन नहीं हो पा रहा है तो आज के इस,संयम दिवस पर वस एक ही नियम ले लो कि हम उन नियमों का पालन करेंगे।

इस अवसर पर ऐलक श्री ने आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के वालक से लेकर आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के जीवन चित्रण का वृतान्त सुनाते हुये कहा कि एक वार विद्याधर जव गिल्ली डंडा खेल रहे थे तो उनकी गिल्ली उचक कर आगे चली गई वंहा पर एक दि. मुनिराज विराजमान थे विद्याधर वंहा पर गिल्ली उठाने पहुंचे तो मुनिराज ने उनको सम्वोधन दिया और पूंछा किसके वेटे हो तो उन्होंने कहा कि में मल्लप्पा जी का वेटा हूं तो मुनि श्री ने पूंछा कि भक्तामर आता है? तो जव उन्होंने उसे याद करने को कहा

ऐलक श्री ने कहा कि यहाँ पर उनके जीवन की शुरुआत हो चुकी थी नौ वर्ष की उम़ में ही वह वहूत मालामाल हो चुके थे। उन्होंने कहा कि आज का दिवस पूरे भारत में जंहा जंहा संघ विराजमान है सारी दुनिया मुनिराज एलं आर्यिकासंघ मना रहा है। उन्होंने आचार्य श्री के स्वास्थय की कामना करते है धर्म संस्कृति की जीवंत कामना की।

उन्होंने अपने गुरू के प्रति समर्पण की भावना व्यक्त करते हुये ये पक्तीयां कही.. “संतों में संत शिरोमणि विद्यासागरजी महाराज, सारे जंहा के संत ऋषी मुनिओं को है नाज, गुरूकुल वना वड़े वावा विराजे हुये पूर्णास्थ, कुन्डलपुर में वन रहा मंदिर वड़ा विशाल हे सदलगा के संत तूमने कर दिया कमाल, दर्शन चारित्र ज्ञान की ये है वनी मशाल, है सदलगा के संत तूने कर दिया कमाल” इस अवसर पर छुल्लक श्री ध्यान भूषण महाराज ने भी सम्वोधन दिया। तत्पश्चात सुधी श्रावको सहित प्रवक्ता अविनाश जेन ने मुनिसंघ को करपात्र में शास्त्र भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

प्रवक्ता अविनाश जैन ने  वताया  आज प्रातःकालीन वेला में मुनि संघ ने जिन मंदिर वंदना के अवसर पर अरिहंत विहार जैन मंदिर से श्री शांतिनाथ जिनालय .पधारे। टृस्ट की ओर से श्री दीपक सेठ एवं संजय सेठ ने मुनि श्री का पाद प्रछालन किया अषाड़ सुदी पंचमी को आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज का 53 वां दीक्षा दिवस के अवसर पर श्री वातसल्य महिला मंडल ने अष्ट द़व्य से थाल सजाकर संगीत मय पूजन ब्र. श्री अनूप भैयाजी, विकास भैयाजी, संजय भैयाजी के साथ की वंही भारत भारती संस्कार जैन महिला मंडल ने 53 दीप सजाकर आरती की एवं पौध का वितरण कर हरयाली वड़ाने की प्रेरणा दी।

कार्यक्रम का संचालन जिनेन्द्र जैंन परख ने किया। इस अवसर पर सदभावना महिला मंडल एवं वालिका मंडल ने अर्घ्य समर्पित किये। तत्पश्चात समाज एवं न्यास के संरक्षक हृदय मोहन जैन, डा. शोभा जैन,वसंत जैंन, राजीव चौधरी, ने आचार्य श्री के जीवन पर प्रकाश डालते हुये सम्वोधन दिया। श्री सकल दि. जैन समाज एवं श्री शीतल बिहार न्यास के पदाधिकारियों सहित मुनिसेवक संघ एवं सभी युवा मंडल,जिनालयों के सभी पुजारियों ने श्री फल अर्पित कर पूज्य गुरुदेव से चातुर्मास करने हेतु निवेदन किया।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन (विदिशा) मध्यप्रदेश

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