“जैसी संगति मिलती वैसी मती होती है” -मुनि श्री विनम्र सागर जी महाराज

0

अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

विदिशा – सत्ता शास्वत होती है सम्भावनाएं प्रतिसत्ता में होती है आचार्य गुरुदेव मूक माटी के माध्यम से आत्मा और पर्याय की सत्ता की बात कर मां धरती और बेटी माटी के सम्वोधन के आपस की बार्ता को कह रहे है कि आत्मा तो शास्वत है जो भी परिवर्तन होता है वह इस पर्याय का ही है उपरोक्त उदगार मुनि श्री विनम्र सागर जी महाराज ने अरिहंत विहार जैन मंदिर में प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये। मुनि श्री ने कहा कि इस जीव के उत्थान और पतन की अनगिनत सम्भावनाएं है,यदि उपादान को समयोचित निमित्त मिल जाऐ है,तो वह छोटा सा वींज भी विशालकाय वट वृक्ष वन जाता है। उन्होंने कहा कि आपके घर का बातावरण ही आपके वच्चों में अनेक सम्भावनाएं पैदा करते है।आजकल के बच्चे वहूत ही इंटेलिजेंट होते है, उनके सामने आप झूंठ मत बोलिये क्यू कि बच्चा जब तेरह साल में प्रवेश करता है,तो उसके अंदर अनगिनत विचार उत्पन्न होते है,वह आपसे उन विचारों को साझा करता है, आप उनकी भावनाओं को समझइये उनसे खिलबाड़ मत करो, आपके  बार बार झूंठ बोलने से बच्चा जब बड़ा होता है तो वह विद्रोह पर उतर आता है। मुनि श्री ने कहा कि बच्चा वही है, यदि उसे अच्छा उपादान मिल जाता है,तो उस बच्चे का भविष्य संम्भल जाता है। घर में एक साथ रहते है लेकिन पिता और बेटा में तथा मां और बेटी में आपस में सम्बाद नहीं होता जबकि आपस में सम्बाद होंना वहूत ही आवश्यक है।आप बच्चों को घर के छोटे मोटे कार्य करने की जिम्मेदारी दीजिये और रविवार या छुट्टी के दिन उनके साथ उनके कार्यों में सहयोग दीजिये,”जो बच्चे घर के छोटे मौटे कार्य करते है तो वह बच्चे कभी वहकते नहीं है”उन्होंने निमित्त और उपादान की चर्चा करते हुये कहा कि यदि आपको जिनवाणी का रहस्य समझने नहीं आता है,तो कोई बात नहीं आप भक्ती का मार्ग अपनाइये, क्यों कि जिनेन्द्र भगवान की भक्ती कभी भी आपका अहित नहीं कर सकती। आत्मा स्वभावं पर भाव भिन्नं  आत्मा का स्वभाव पर भाव से भिन्न है। मुनि श्री ने संगति का उदाहरण देते हुये कहा कि जैसे जल धूल में मिलने से कींचड़ वन जाती है,वंही वह जल नीम में जाकर कड़वाहट पैदा करती है और सागर में पहुंच कर खारी हो जाता है, विषधर के पास पहुंच जहर वन जाता है,उसी प्रकार सत्संगति से यह मनुष्य का जीवन निखर जाता है। घर का वातावरण यदि कड़वाहट से भरा है तो वह सभी के मन को कड़वाहट पैदा करेगा,और साधु संगति में रहेगा तो जैसे जल की बूंद स्वाती नक्षत्र में सीप में पहुंचती है तो मोती वन जाते है। बैसे ही सत्संगति से मनुष्य का जीवन मोती समान कींमती वन जाया करता है। मुनि श्री ने कहा कि जैन दर्शन अकृमण्यता की ओर इशारा नहीं करता आपको अपनी क्षमताओं का पूरा उपयोग करना चाहिये। जितनी आपकी ताकत है उतना पैसा कमाइये लेकिन अपने पास उतना ही रखो और ज्यादा कमा रहे हो तो उसे धर्म और। संस्कृति की रक्षा में लगाओ। मुनि श्री ने कहा कि आप अपने बच्चों को हमेशा अच्छे कार्यों की ओर प्रोत्साहित कीजिये तो वह कभी वुराई की ओर नहीं जाऐंगे। उपरोक्त जानकारी श्री सकल दि. जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने देते हुये बताया प्रतिदिन प्रवचन यू टियूव चैनल के माध्यम से प्रातः8:30 वजे प्रसारित हो रहे है।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन विदिशा,मध्यप्रदेश
संपर्क – 7828782835/8989696947

Leave A Reply

Your email address will not be published.