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सब से ज्यादा दान-शील-तप-भाव-भक्ति इन 8 दिनों में होती है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर। श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर तथा साध्वी भद्रिकाश्रीजी म. ने धर्म संदेश मे बताया कि – जैनों का अतिप्रसिद्ध पर्व है पर्युषण । सब से ज्यादा दान-शील-तप-भाव-भक्ति इन 8 दिनों में होती है । बच्चे से लेकर बुट्ढे तक सब लोक अपनी-अपनी सब प्रवृत्ति छोडकर इस पर्व आराधना में जुट जाते है । इन दिनों में न केवल पुण्य का कार्य होता है, अपितु पाप के क्षय का कार्य बड़े पैमाने पे होता है । पापों के साथ-साथ पापवृत्ति का भी ह्रास होता है ।

मतलब पाप की प्रवृत्ति-वृत्ति दोनों में गिरावट आती है । गुरुभगवंतों की और शास्त्रों के मार्ग दर्शन से, जिनाज्ञा सापेक्ष धर्म आराधना करनी चाहिए । इच्छानुसार धर्म करने से लाभ के बजाय नुकसान होता है ।आज का विषय है पौषधव्रत का । ऐसे देखें तो श्रावक को पर्व तिथि में पौषध लेना है । पर्व दिनों में विशेष करना है । एक पौषध से 30 सामायिक का लाभ मिलता है । एक सामायिक करने से 320 करोड़ तोला सोने के दान करने से जो पुण्यप्राप्त होता है, उससे ज्यादा पुण्य प्राप्त होता है । जो धर्म की पुष्टि करता है उसे पौषध कहा जाता है ।

कल्पसूत्र में लिखा है – संसार सागर से पार उतारने वाला पौषध है । पौषध कई सारे पाप नष्ट होते है, साथ-साथ कइ सारे गुणों का विकास भी होता है । साधु जीवन की तालीम मिलती है । पौषधव्रत के 80 विकल्प है । समता का सुख अप्रतिम गिना जाता है, वह समता सुख का आस्वाद पौषध से प्राप्त होता है ।वीरप्रभु का जब निर्वाण हुआ, तब श्रेणिक राजा के 18 गणराजाओं ने पौषधोपवास किया था । यानी उपवास रूप पौषध किया था । पौषध के 18 दोष और सामायिक का 32 दोष टालकर पौषध करना चाहिए । 8 प्रहर का एक पौषध से 27,77,77,77,777 पल्योपम से ज्यादा वर्ष की वैमानिक देवलोक की आयु बांधी जाती है । सामायिक-पौषध समता की साधना है ।

बिना समता-समभाव आज तक किसीने मुक्ति नहीं पाई है । राग-द्वेष से परे रहना यह समता है । इस पौषध के विषय में चन्द्रवतंसक-सागरचन्द्र-कामदेव-सुदर्शन शेठ-सुलसा श्राविका-सुव्रतशेठ आदि अनेक दृष्टांत शास्त्र में मौजूद है । जिन्होंने अनेक कष्ट-पीड़ा आने पर भी अपनी प्रतिज्ञा अखंड पाली । देवों की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए । पौषध में मुख्यतया चार क्रिया आती है । 1.सावद्य – पाप व्यापार का त्याग 2.ब्रह्मचर्य का पालन 3.स्नान-विभूषा का त्याग 4.उपवास आदि तप । योगशास्त्र में लिखा है – उस गृहस्थ को धन्य है – जो दुष्कर पौषध व्रत का चुलनी पिता जैसा पालन करता है । 

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