जैन समाचार

हृदय में संयम भाव, जीवन की दिशा बदल देता है- आचार्य मणिप्रभ


जहाज मंदिर मांडवला दि. 21 अगस्त 2020 !
‘‘माता-पिता से मिले संस्कार बाल मन को परमात्मा के प्रति श्रद्धा और आस्था से जोड़ता है। यदि संस्कार हृदय में संयम भाव जगाता है जो जीवन की दिशा बदल देता है। जीवन के साथ मृत्यु जुड़ी है किन्तु कब? कहाँ? और कैसे तय नहीं है। जब तक जीवन है वर्तमान को सुधारो, आत्मभाव जागृत करो।’’ उक्त विचार जहाज मंदिर मांडवला में आज धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए आचार्य जिनमणिप्रभसूरीश्वर महाराज ने प्रकट किए। उन्होंने श्रोताओं को संदेश दिया कि जैसा कर्म करोगे वैसा ही फल मिलेगा।


श्री जिनकांतिसागरसूरि स्मारक ट्रस्ट मांडवला और जहाज मंदिर चातुर्मास समिति द्वारा आयोजित प्रवचन श्रृंखला में श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि पर्यूषण पर्व के अंतिम दिनों में बचे समय का उपयोग तपश्चर्या में समर्पित कर हृदय में उठे संयम भाव को कार्य रूप में परिणित करें। यह संयम भाव जीवन की दिशा बदल देता है। जैसा कर्म होगा वैसा ही फल मिलेगा। संयम और तपश्चर्या से हम अपना वर्तमान और भविष्य दोनों ही सुधार सकते हैं।
आचार्यश्री ने जैन धर्म की ऐतिहासिक व्याख्या करते हुए कहा कि आचार्यों और गुरूभगवंतों ने अपने संयम आचरण से कर्मबंधनों को तोड़ने निरन्तर साधना की और निरंतर विहार करते हुए निर्भय होकर सामान्यजनों को भी धर्म में दीक्षित कर उन्हें जिन सिद्धांतों, आदर्शों और साधना सिद्धांतों से परिचित कराया। आचार्यश्री ने परमात्मा आदिनाथ, परमात्मा महावीर, गुरू गौतम स्वामी, सुधर्मास्वामी, जम्बूस्वामी आदि के धर्म के लिए किए गए त्याग और कष्टों में भी निर्भय होकर कर्मरत रहने का उदाहरण देते हुए कहा कि आज हम जिनधर्म को जिस रूप में देख रहे हैं उसे हम तक पहुँचाने का पुरूषार्थ करने वाले गुरू भगवंत आचार्यों और साधु समाज की एक लम्बी श्रृंखला है।
धर्मध्वजा वाहकों में जम्बूस्वामी के जीवन की कथा सुनाते हुए आचार्यश्री ने कहा कि 8 कन्याओं से विवाह करने वाले जम्बूस्वामी ने विवाह के पूर्व ही सांसारिक जीवन त्यागने का दृढ़ निश्चय कर लिया था। आठों नव-विवाहिताओं ने जम्बूस्वामी के हृदय को बदलने अनेक तर्क दिए किन्तु जम्बूस्वामी के तर्कों से हारी आठों नव विवाहिताओं को भी संन्यास लेने प्रेरित किया। नव विवाहिताओं का मन बदला तो उन्होंने भी संन्यास ले लिया है। महल में चोरी करने आए डाकू प्रभव और उसके साथियों का मन भी साधु जम्बूस्वामी के वचनों से बदल गया और वे भी चोरी छोड़कर साधु बन गए। आचार्यश्री ने जम्बू स्वामी, प्रभवस्वामी, शयंभव, मनक मुनि आदि संतों के जीवन की विवेचना करते हुए धर्म साधना, धर्मरक्षा और धर्म प्रसार के प्रति उनकी दृढ़ता को प्रदर्शित करने वाले पुरूषार्थ से धर्मसभा को अवगत कराया।


सभा को सम्बोधित करते हुए आचार्यश्री ने जिनधर्म के इतिहास का लम्बा परिचय देते हुए उसके विकास, दिगम्बर और श्वेताम्बर जैन सम्प्रदाय विभाजन और उसमें बाद में हुए अन्य विभाजनों खरतरगच्छ परम्पराओं और खरतरगच्छ सहित अन्य गच्छों के बनने की ऐतिहासिक जानकारी से श्रोताओं को परिचित कराते हुए कहा कि हम चाहे श्वेताम्बर हो चाहे दिगम्बर, किसी भी गच्छ व्यवस्था से जुड़े है। हमें यह याद रखना चाहिए कि सभी जैन परमात्मा महावीर के अनुयायी है। जैनधर्म का मूल है अहिंसा, प्रेम और समभाव। सभी जैन है, जिन धर्म के वाहक और पालनकर्ता है। सभी जैन एक है।


इस अवसर पर आचार्य जिनमनोज्ञसूरि महाराज, मुनि मयंकप्रभसागर, मुनि मनितप्रभसागर सहित प्रवर्तिनी साध्वी शशिप्रभाश्रीजी, साध्वी कल्पलताश्रीजी, साध्वी विमलप्रभाश्रीजी आदि उपस्थित थे।
सभा का संचालन जहाज मंदिर के कार्याध्यक्ष द्वारकादास डोसी एवं सहमंत्री सूरजमल देवडा धोका ने किया।
इस अवसर पर शांतिलाल छाजेड, रमेश गोकलानी, किशोर बोथरा, मदनलाल मालू, सुनील बोथरा, दीक्षित बोहरा, मुकेश प्रजापत, महावीर जैन, स्वरूप जैन, भानुप्रताप जैन आदि कार्यकर्ता उपस्थित थे।

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