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इंसान ने कुदरत को नाराज बहुत किया है – देवेंद्रसागरसूरि

राजाजीनगर लुणिया भवन में बिराजमान आचार्य श्री देवेंद्रसागर जी ने कहा की प्राकृतिक आपदाएं शाश्वत सत्य हैं। इंसानी सभ्यता की शुरुआत के साथ ही इनका भी इतिहास रहा है। ये तब भी कहर ढाती थीं और आज भी बरसा रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले इनके कोप का शिकार जल्दी-जल्दी नहीं होना पड़ता था। उनमें एक लंबा अंतराल होता था। अब आए दिन प्राकृतिक आपदाओं से इंसान को दो-चार होना पड़ रहा है। विश्वभर  में आई आपदा की आफत इसी की एक बानगी है। प्रकृति की सत्ता सबसे ताकतवर है। उसकी लाठी में बहुत जान है। इसके प्यार की लाठी सहारा बन जाती है और क्रोध की लाठी जान ले लेती है। लिहाजा प्रकृति के नैसर्गिक रूप पुनर्धारण के रास्ते में जो कोई भी आता है, बह जाता है, भस्म हो जाता है और उड़ जाता है।प्राकृतिक आपदाएं प्रकृति की मुखरता का माध्यम मानी जाती रही हैं।

प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को लेकर इंसानी गतिविधियों के खिलाफ कुदरत द्वारा विरोध का जताने का जरिया कही जाती रही हैं। यही वजह है कि पीड़ा की पोटली साथ लानेवाली किसी विपदा से कोई न कोई सकारात्मक पहलू भी जुड़ा होता है। इन दिनों कोरोना संकट से भारत ही नहीं पूरी दुनिया जूझ रही है। लॉकडाउन में इन्सान घरों में कैद हो गए हैं। उनकी भागती-दौड़ती जिन्दगी में ठहराव आ गया है लेकिन इंसानों के इस  ठहराव ने प्रकृति के ठहरे हुए जीवन को गति दी है। कुदरत के खूबसूरत रंगों से हमें फिर रूबरू करवाया है। अंत में आचार्य श्री ने कहा की हमने दूसरे राष्ट्रों को मात देने के लिए बड़े-बड़े हथियार और बम बना लिए, दूसरे ग्रहों पर पहुंच गए, पलक झपकते ही दुनिया के किसी भी हिस्से में पहुंचने या खरीदारी करने का इंतजाम कर लिया, लेकिन विरोधाभास देखिए कि एक अतिसूक्ष्म वायरस से मुकाबला करने में अक्षम साबित हो रहे हैं। किसी ने सही कहा है शहरों का सन्नाटा बता रहा है इंसान ने कुदरत को नाराज बहुत किया है।

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