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ज्ञान अंत हीन और अनंत है-मुनि श्री समता सागर जी महाराज

मध्यप्रदेश अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन
विदिशा(भद्दलपुर) – कोई राजमहल में रोऐ, कोई पर्णकुटी में सोऐ, जन्म की गलियां अलग अलग, मरण का मरघट एक है,उपरोक्त पक्तियां व्यक्त करते हुये मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने प्रातःकालीन जैन तत्व   वोध व्याख्यान माला के चतुर्थ दिवस स्टेशन जैन मंदिर में व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि “ज्ञान अंत हीन और अनंत है”भले ही हम ज्ञान प्राप्त न कर पाऐं लेकिन ज्ञान प्राप्ती की आकांक्षा हमें सदैव रहना चाहिए। ज्ञान का कोई अंतिम पृष्ठ नहीं होता। उन्होंने कहा कि  स्वाध्याय का मूल लक्ष्य है, शव्द से अर्थ की और यात्रा
उन्होंने कहा कि यदि हम मात्र शव्द को ही पकड़े रहेंगे और उसके अर्थ में नहीं गये तो हमारा स्वाध्याय अर्थ हीन हो जाऐगा। स्वाध्याय करने से अपनी प्रतिभा के द्वारा गलत धारणाओं को निकाल सकते है। हालांकि ज्ञान विना गुरु के प्राप्त नहीं होता इसलिये ज्ञान की प्राप्ती के लिये गुरु का होंना आवश्यक हैं।
इसीलिये कहा गया है कि आचार्य प्रणीत ग्रन्थों का ही स्वाध्याय करना चाहिए। हो सकता है, स्वाध्याय करने में उत्तर जल्दी नहीं मिले पर यदि उसका समाधान नहीं मिल रहा है, तो कभी निराश नहीं हों प्रश्न है, तो उत्तर भी जरूर मिलेगा। उन्होंने ध्यान की चर्चा करते हुये कहा कि एक साधक जब ध्यान में लीन हो जाता है, तो फिर ग्रन्थ का आलंवन नहीं रहता, वह अपनी निर्ग्रन्थ अवस्था में ही चारित्र को ग्रहण कर केवल्य ज्ञान को प्राप्त कर लेता है।
उन्होने कहा कि ज्ञान का सार समता की प्राप्ती है, आचार्य श्री हमेशा कहते है, कि “सव शास्त्रों का सार है, समता विन सव धूल” उन्होंने कहा “समता सागर नहीं” नाम में मत जाना नाम तो कुछ भी हो सकता है, सामायिक का भाव ही समता रुपी परिणाम है। ज्ञान के साथ चारित्र का होंना परम आवश्यक है। समता भाव को कुटिया और महल से नहीं वांधा जा सकता है।  एक साधक यदि समता के साथ साथ अपनी साधना को करता है तो वह अपने मूल लक्ष्य को पा सकता है।
उन्होंने कहा कि साधन सुख प्रदान कर सकते है, लेकिन सुख नहीं दे पाते। सुख और दुःख हमारे परिणामों पर आधारित है, उन्होंने सप्त व्यसनों की चर्चा करते हुये कहा कि व्यसन और वुराइयां व्यक्ति को पतन की ओर ले जाते है। इससे राष्ट्र का भी पतन होता है। मुनि श्रीने कहा कि यदि करोड़पती भी हो लेकिन यदि व्यक्ति व्यसनों में लग गया तो वह अपनी सारी संपत्ति को खो वैठता हैं। व्यसन और वुराइयां संपन्न  व्यक्ती को भी निर्धन वना देती है। जो व्यक्ती के पतन का कारण वनता है।
 उन्होंने कहा कि स्वाध्याय परम तप तभी है जव वह वृतों को अंगीकार करे। ज्ञान भले ही कमजोर हो जाऐ लेकिन व्यक्ति चारित्रवान होंना चाहिये।पड़ना पड़ाना आसान लगता है, ज्ञान की वात तो सभी को अच्छी लगती है,लेकिन मन से यदि चारित्र को ग्रहण नहीं किया तो ज्ञान मात्र ऊपर ऊपर का है मुनि श्री ने कहा कि एक वार यदि ज्ञान न भी हो तो चलेगा लेकिन चारित्र का होना आवश्यक है।
इस अवसर पर ऐलक श्री निश्चयसागर जी महाराज ने कुंद कुंद का कुंदन का स्वाध्याय कराते हुये धर्मोपदेश दिये। प्रवक्ता अविनाश जैन ने वताया कि रविवार को टोटल लांकडाऊन के अन्तर्गत मुनिसंघ शीतलधाम पर ही रहेंगे। एवं इस दिवस उपवास रहेगा।
~ब्यूरो चीफ देवांश जैन (विदिशा) मध्यप्रदेश

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