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ज्ञान और ज्ञानदाता के प्रति सम्मान से ज्ञान बढ़ता है : आचार्य महाश्रमण जी

अहिंसा क्रांति / राजेन्द्र बोथरा
AHINSA KRANTI / 22/07/2020
हैदराबाद।  ठाणं आगम में कहा गया है कृतिका नक्षत्र के छह तारे हैं अश्लेषा नक्षत्र के छह तारे हैं। हमारी सृष्टि की व्यवस्थाएं हैं ,ऐसा लगता है कुछ नियम है और वह नियम जो है उनके अनुसार सृष्टि की व्यवस्था भी चल रही है ।हमारी सृष्टि में सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्र और तारे हैं ठाणं आगम में कृतिका नक्षत्र और अश्लेषा नक्षत्र की बात बताई गई है।
जैन सिद्धांत में चार प्रकार के देव बताए गए हैं उनमें एक हैं ज्योतिष्क देव। ज्योतिष्क देव के पांच प्रकार हैं- सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्र, तारा। ठाणं आगम में नक्षत्र और तारा की मानो एक नियम की बात बताई है कि कृतिका वह अश्लेषा नक्षत्र के तारे छह हैं। हमारी सृष्टि में प्रकाश भी होता है और अंधकार भी होता है ।सूर्य से, चंद्रमा से, तारों से भी प्रकाश होता है, तो प्रकाश हमारी सृष्टि में होता है और साथ में अंधकार भी जुड़ा होता है, पक्ष- प्रतिपक्ष दोनों जुड़े हैं, हमारे सृष्टि में विरोधी तत्व भी रहते हैं। तो यह हमारी सृष्टि है इसमें एक तत्व है प्रकाश, हमें इस प्रकाश पर ध्यान देना चाहिए कि बाहर के प्रकाश का भी कितना मूल्य है ,सूर्य उदित हो जाता है कितना प्रकाश फैल जाता है और आसानी से चीजें दिखाई देने लग जाती है, रात्रि में अंधकार होता है, स्वाभाविक रूप में तो अंधकार हैं किंतु कृत्रिम उपायों से उस अंधकार को कुछ परास्त करने का प्रयास ट्यूबलाइट, बल्ब से किया जा रहा है। तो यह भी जो अंधकार में प्रकाश का प्रयास किया जा रहा है, यह बाहर का प्रकाश भी महत्वपूर्ण है ।प्रकाश हो गया तो साधु के लिए जीवों को देखना आसान हो जाता है अहिंसा की साधना में प्रकाश का सहयोग रहता है‌। हम भीतर के प्रकाश के बारे में भी ध्यान दें कि अंधकार हावी न हो जाए, अंधकार आ गया लगे तो उसको छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया जा सकता है।
“माना कि अंधकार है घना,
पर मेरे मित्र दीपक जलाना कब है मना”
दुनिया में अज्ञान का अंधकार है, जितनी ज्ञान की रोशनी बंटी जा सके, बांटने का प्रयास करें तो अज्ञान का अंधकार दूर हो सकता है। ज्ञान का प्रकाश हमें जितना प्राप्त है उतना है, वह और ज्यादा कैसे हो सके, सूर्य चंद्र ग्रह नक्षत्र तारा की बात है। तो हम ज्ञान के संदर्भ में देखें तो केवल ज्ञान को सूर्य के समान एक अपेक्षा से, किसी अंश में देखा जा सकता है। केवल ज्ञान जिसको हो गया मान लो ज्ञान का सूर्य उदित हो गया, संपूर्ण ज्ञान उसको प्राप्त हो गया ,जैसे सूर्य उदित होने के बाद दीपक की अपेक्षा नहीं रहती, वैसे ही केवल ज्ञान होने के बाद छोटे-छोटे ग्रंथों की आवश्यकता नहीं रहती ।ज्ञान का प्रकाश हमारा कैसे हो, स्वाध्याय एक साधन है जिसके द्वारा ज्ञान बढ़ सकता है ,
तो हमारे जीवन में ज्ञान का विकास हो। सबसे पहले ज्ञान के प्रति हमारे मन में सम्मान, निष्ठा होनी चाहिए कि मुझे ज्ञान चाहिए और जो ज्ञान देने वाला है उसके प्रति सम्मान का भाव रहे। ज्ञान और ज्ञानदाता दोनों के प्रति सम्मान और फिर यह एकाग्रता ,धैर्य, विषय की गहराई में जाने का प्रयास और व्यवहार में भी शालीनता, उत्तर देने में भी शालीनता, यह सब चीजें होती है तो ज्ञान बहुत अच्छे तरीके से प्रकट हो सकता है। तो यह शास्त्रकार ने जो बताया है ठाणं में, कृतिका नक्षत्र के छह तारे हैं ,अश्लेषा नक्षत्र के छह तारे हैं। यह हमारी सृष्टी की व्यवस्था की मानो बात है। हमारे शास्त्रों में विभिन्न बातें बताई गई है, हम ज्ञान के प्रति सम्मान रखें और अपने जो ज्ञानदाता है उनके प्रति भी समुचित सम्मान रखें तो हमारा ज्ञान और साथ में एकाग्रता, धीरता, शालीनता हो तो वह ज्ञान हमारा अच्छे ढंग से प्रकट होने की संभावना हो सकती है।

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