बड़े भक्ति भाव से कलश स्थापना संपन्न

AHINSA KRANTI / SANMATI JAIN
सनावद:- भक्तमार वाले बाबा के नाम से ख्याति प्राप्त डॉ. आचार्य श्री 108 प्रणाम सागर जी महाराजके चातुर्मास को लेकर मंगल कलश स्थापना की गई। प्रवक्ता सन्मति काका ने बताया कि स्थानीय सकल जैन समाज के अलावा खंडवा,भीकनगांव, बेड़िया, धमानोद इनआदि क्षेत्रों के श्रद्धालुओं की उपस्थिति के बीच मांगलिक क्रियाओं के साथआचार्य श्री की ओर से पावन चातुर्मास मंगल कलश स्थापना की गई।आरंभ में पुष्पदंत सागर जी महाराज शांतिसागर महाराज एवं वर्धमानसागर महाराज के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्जवलन सभी बाहर से पधारे अथितियों के द्वारा किया गया। ततपश्चात मंगलाचरण प्रदिती प्रधान धामनोद द्वारा किया गया। अगली कड़ी में आचार्य श्री के पाद प्रक्षालन व सभी पूर्वाचार्यों व आचार्य पुष्पदंत सागरजी एवम आचार्य वर्धमान सागर सहित आचार्य प्रणाम सागर जी महाराज के महा अर्घ चढ़ाने काशोभाग्य डॉ. राहुल स्वस्तिक परिवार को प्राप्त हूवा। इस अवशर पर आचार्य श्री को शास्त्र भेंट करने का शोभाग्य शोभा पारस कुमार जी जैन व क्षुल्लकश्री प्रथम सागर जी को शास्त्र भेंट करने का शोभाग्य सुरेश कुमार मुंसी परिवार को मिला वहीं क्षुल्लक जी को वस्त्र भेंट करने का शोभाग्य सतेंद्र कुमार जैन को प्राप्त हूवा ।
प्रथम मंगल चातुर्मास कलश ऋतिक शुधीर कुमार जैन सनावद
द्वितीय भक्तमार शक्ति कलश श्रीमान राजेश कुमार कैलाश चंद जटाले सनावद
तृतीय नवग्रह कलश उदयचंदजी पहाड़िया सनावद
व चतुर्थ कलश प्रथामाचर्य शान्ति सागर कलश श्रीमती शोभा चौधरी सनावदएवम
पंचम रत्नत्रय कलश श्रीमति शुबोध बाई इंदर चंद जी जैन सनावद को मिला। वही
अखण्ड दीपक प्रज्वलन करने का शोभाग्य पवन कुमार गोधा को प्राप्त हूवा इस अवशर पर आचार्य श्री जी अपने उध्बोधन में कहा की
चातुर्मास जैन समाज के लिये एक त्यौहार है जो 4 माह तक मनाया जाता है ।
चातुर्मास में दो व्यक्तियों की जरूरत होती है एक तो भरोसा दूसरा भरोसे को समझने वाला। उन्होंने बताया कि चातुर्मास एक स्थान पर स्थित होकर धर्म को आत्मसात करने का मुख्य आधार है। यह चेतना के जागरण की निर्मल प्रक्रिया है। धर्म ही आत्मा के रुपांतरण का पवित्र अनुष्ठान प्रयोग है। जिस प्रकार वर्षा जमीन से मिलती है तो वर्षायोग बन जाता है उसी प्रकार संत श्रावक का मिलन तीथ समान माना जाता है।
उन्होंने कहा कि वर्षा योग में चेतना पर अभयदान की वर्षा ,परमात्मा को पाने का उपाय सात्विक जीवन जीने की कला सीखने का अवसर होने के साथ साथ जीवन से पलायन नहीं जीवन परायण की कला है।
आत्मसाधना का तरीका पुण्य कमाने का तरीका जीव रक्षा का पावन अवसर पर चातुर्मास को माना गया है। चातुर्मास में साधु संत चार माह तक एक स्थान पर साधना करते है। इसका मुख्य कारण बरसात में होने वाले जीवों की हत्या अधिक होती है इसलिए संत एक स्थान पर रह कर चातुर्मास करते है। आचार्य श्री ने कलश में डालने वाली वस्तुओं जैसे पारा,सुपारी,बादाम,लौंग, इलायची, हल्दी,सरशो, नवरत्न इत्यादि वस्तुओं का भी महत्त्व बताया। साथ ही इस अवशर पर भक्तमार जी की पुस्तक का विमोचन भी किया गया।
इस मौके पर प्रदीप पंचोलिया,संगीता पाटोदी, कमल केके, सुदेश जटाले, ने सुमधुर भजन प्रस्तुत किये।
सभा का संचालन प्रसांत चौधरी ने किया।
इस अवशर पर मुनित्यागी सेवा समिति अध्यक्ष मुकेश जैन,समाज अध्यक्ष मनोज जैन, ब्रमचारी नमन भईया,अतिशय जैन,अक्षय जैन,संतोष बाकलीवाल, मनीष पांड्या ,दि.युवा संघ के सभी सदस्य सहित सभी समाजजन उपस्थित थे।

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