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पुरुषार्थ के हाथों भाग्य का बदलना सम्भव है : देवेंद्रसागरसूरि

AHINSA KRANTI NEWS

आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन के माध्यम से कहा की सफलता और संघर्ष, आशा और निराशा, हर्ष और विषाद साथ-साथ चलते हैं। चुनौतियां केवल बुलंदियों को छूने की नहीं होतीं, खुद को वहां बनाए रखने की भी होती हैं। ठीक है कि एक काम करते-करते हम उसमें कुशल हो जाते हैं। उसे करना आसान हो जाता है। पर वही करते रह जाना, हमें अपने ही बनाए सुविधा के घेरे में कैद कर लेता है। आचार्य श्री आगे बोले की कठिन रास्ते ही हमें ऊंचाइयों तक ले जाते हैं।

प्रश्न है कि इन कठिन रास्तों पर डग भरने एवं कुछ अनूठा करने का साहसिक प्रयत्न तो कोई शुरू करे।रोशनी का यह सफर तय करना बहुत कठिन है। तेजस्विता और तपस्विता की यह साधना बहुत कठिन है। इस साधना से त्याग भी जुड़ा है। सबके अंधेरों को समेटने के लिए कहां कौन आगे आते हैं, जबकि यहां तो हर कोई खुद को उजाले में लाने की स्वार्थी आकांक्षा में न जाने कितनों के जीवन से रोशनी छीन लेते हैं। अपनी गलतियों के बारे में बात करते हुए हमारे कई किंतु-परंतु होते हैं।

हम समय और स्थितियों की भी बात करते हैं और अपने लिए छूट और माफी भी चाहते हैं। लेकिन क्या तब भी ऐसा करते हैं, जब गलतियां दूसरों की होती हैं? जब हम दूसरों को उनके दृष्टिकोण और परिस्थितियों में पहुंचकर देखते हैं, तब उनकी गलतियां उतनी बड़ी नहीं दिखाई देतीं।’ ऐसे में ईमानदार प्रयत्नों का सफर आगे कैसे बढ़े? जब शुरुआत में ही लगने लगे कि जो काम मैं अब तक नहीं कर सका, भला दूसरा कैसे कर सकेगा? कितना बौना चिंतन है आदमी के मन का, कि मैं तो बुरा हूं ही, पर दूसरा कोई भी अच्छा कैसे बन सकता है।

वे आगे बोले की जब हम कुछ करने की ठानते हैं तो सफलता ही मिले, यह जरूरी नहीं। कई बार सब करने पर भी निराशा मिलती है। तब हम अपनी ही सोच और क्षमताओं पर संदेह करने लगते हैं। लगता है कि अब कुछ नहीं हो सकता। भगवान महावीर का संदेश था कि हमारे स्वीकृत उद्देश्यों के प्रति आस्था, समर्पण और दृढ़ निश्चय जुड़ा रहे। पुरुषार्थ के हाथों भाग्य बदलने का गहरा आत्मविश्वास सुरक्षा पाए। एक के लिए सब, सबके लिए एक की चेतना जागे। साहस एवं आत्मविश्वास की एक किरण कभी पूरा सूरज नहीं बनती। पर यह भी सच है कि जिसे एक किरण मिल जाती है, वह संपूर्ण सूरज बनने की दिशा में प्रस्थान कर देता है।

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