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पुण्य के उदय काल में जीव डरता घबराता नहीं है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

मैसूर।  श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर तथा साध्वी भद्रिकाश्रीजी म. ने धर्म संदेश में बताया कि – जैनधर्म के मुताबिक जीव-अजीव आदि नौ तत्त्व है । उसमें पुण्य-पाप भी गिने जाते है । पुण्य और पाप दोनों आश्रव के ही प्रकार है । आश्रव के बाद वह कर्म शुभ (पुण्य)और अशुभ (पाप) ऐसे दो भाग में बंट जाते है । शुभकर्म यानी पुण्यकर्म हरजीव को पसंद है । सुख-अनुकूलता-सम्मान किसको पसंद नहीं होता ? पसंद ना आनेवाली चीज है दुःख-प्रतिकूलता-अपमान। कर्म के फल कभी भी उम्मीद के अनुसार नहीं बल्कि क्रिया के अनुरूप मिलता है । अशुभ कर्म से बचना है तो अशुभ क्रियासे परे ही चाहिए ।

हिंसा-चौरी-असत्य-मैथुन सेवन-परिग्रह का ममत्व-क्रोध-मान-माया-लोभ-राग-द्वेष-कलह-झूठा आरोप-निंदा-चुगली-रति-अरति-माया के साथ असत्य-मिथ्यात्व – ये सब पाप है । यह सब करने से पाप का बंध होता है । पापोपार्जन की ये अठारह दुकानें है । उसके सामने पुण्य कमाने की दुकानें नौ है । अन्नपुण्य-पानीपुण्य-वस्त्रपुण्य-वसतिपुण्य-शय्यापुण्य-मनपुण्य-वचनपुण्य-कायपुण्य-नमस्कार पुण्य । यह नौ दुकानों से पुण्य की कमाई-आमदनी होती है । ऐसे पुण्य करनेवालें को पुण्य के उदयकाल में सुख-शांति-समाधि-आनंद-अनुकूलता-सम्मान की प्राप्ति होती है । पुण्य की नौ दुकानों में 42 खाते है । जबकि पाप की अठारह दुकानों में 82 खाते है ।पुण्य के उदय काल में जीव डरता घबराता नहीं है । क्योंकि – उस समय खुशहाली का होता है ।

जीव सुख-आनंद-खुशहाली के समय के किसी को समझता है और अभिमान के नशे में आ जाता है । लेकिन जब पाप का उदय होता है – तब डरता है – घबराता है । अकुलाता है । उतना ही नहीं, उस समय दूसरे को जिम्मेदार समझकर उनके प्रति क्रोध या द्वेष करता है । दुश्मन मानने लगता है । उत्तराध्ययन सूत्र में लिखा है । आत्मा का मित्र या शत्रु अपनी आत्मा ही है । बाहर कोई दुश्मन नहीं, अपने दुश्मन अपने भीतर ही बैठे है । बाहरी दुश्मनों से जुझने से कोई फायदा नहीं होगा । भीतर के दुश्मनों को जब तक हम हराते नहीं है, वहां तक बाहर के दुश्मन रहनेवाले ही है । इसके लिए पस्तहिम्मत होकर बैठना नहीं है । बलीजोरावर होकर भीतरी दुश्मनों से लड़ाई करनी है । बहादुरी और पराक्रम दिखाना है । भीतर के दुश्मनों को पराजय दे दिया, उनके सामने विजय प्राप्त कर लिया तो समझ लेना अभी बाहर के दुश्मनों से बहस करने की जरूरत नहीं रहेगी ।पापी आत्मा अपने पाप के उदय से पीड़ित होती है । दूसरे तो मात्र निमित्त है । निमित्त को नही, उपादान (अपनी आत्मा) को देखो । उपादान को ठीक करों । उपादान ठीक होने पर निमित्तों से जूझने की आवश्यकता नहीं रहती।

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