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चीजें खोजाएं तो खोजें, परंतु जीवन का चैन मत खोने दें : मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मध्यप्रदेश अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

सागर -अगली सांस का किसी को कोई भरोसा नहीं होता। आदमी मरता है तो उसकी ठठरी बंधती है, दाग दिया जाता है और वह पंचतत्व में विलीन हो जाता है। दो दिन बाद शोकसभा होती है उसमें उसकी प्रशंसा होती है। उसके विरोधी भी उसकी प्रशंसा के कसीदे पढ़ते हैं। मरने के बाद तो सभी की प्रशंसा होती है।


यह बात मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज ने भाग्योदय तीर्थ में लाइव प्रवचन में कही। मुनिश्री ने कहा विपत्ति बीमारी वियोग सब को तोड़ देती है। जो संयोग में सुखी होगा वह भी वियोग में दुखी होगा। विडंबना यह है न संयोग हमारे हाथ में है और न ही वियोग हमारे हाथ में।

जो सच्चाई जानता है वह दोनों में विचलित नहीं होता है। और जो नहीं जानता है वह कभी हर्ष में रहता है तो कभी दुखी होता है। हमारी एक सांस भी हमारे नियंत्रण में नहीं होती है। यह प्रकृति की व्यवस्था है। इसे सब जानते हैं और जो जानते हैं, वे कभी विचलित नहीं होते हैं और जो नहीं जानते हैं वे हमेशा दुखी होते हैं।

संयोग वियोग नहीं होता तो हमारे लिए जगह नहीं होती। जो पुरखे हमें अपनी जगह खाली करके छोड़ कर चले गए हैं हमें भी एक दिन अपनी जगह छोड़ करके जाना है। पत्ते झड़ते हैं तभी तो नए पत्ते आते हैं। यह सृष्टि का नियम है यदि सूरज 1 दिन नहीं डूबे तो दिन भर गर्मी होगी।

मुनिश्री ने कहा कभी कोई वियोग देखें तो विचलित नहीं हों। उन्होंने कहा शोक में जो लोग अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं बुद्धि को काठ मार जाता है। जीवन मशीन जैसा बन जाता है। शोक में आंसू बहाओगे तो क्या वह लौटकर आ सकता है। उन्होंने कहा चीजें खोए तो खोजो परंतु चैन मत खो दें।


माया की गांठ काफी बड़ी है, संसार में उसी के खोने का भय नहीं है मुनिश्री ने कहा पहले तीर्थंकर आदिनाथ भगवान को नीलांजना नृत्यांगना की मृत्यु में पता चल गया था कि कितनी सांसे हैं और उन्होंने वास्तविक जीवन को जान लिया। मेरी चेतना कब चली जाएगी यह काया भी और माया भी अमर नहीं है। सब नश्वर है।

मुझे अपनी आत्मा के अमरत्व को प्राप्त करना है। हमें बाहरी नीलांजना का नहीं भीतरी नीलांजना का ध्यान रखना है। और भगवान ऋषभदेव सारा राजपाट छोड़कर के निकल गए। अब तो व्यक्ति को श्मशान में भी बैराग नहीं होता है। माया की गांठ काफी बड़ी है। संसार में उसी के खोने का भय नहीं है।

यह मनुष्य पर्याय बार-बार मिलने वाली भी नहीं है। काल एक बार में सब कुछ विनष्ट कर देता है संसार का यथार्थ सामने रखना चाहिए। वैराग्य हो, आशक्ति हो तो हमारा जीवन धन्य हो जाएगा। संसार शोक मय है, काया रोग मय है जीवन भोग मय है और संबंध वियोग मय है।

ब्यूरो चीफ देवांश जैन (विदिशा) मध्यप्रदेश

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