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शर्म से या प्रत्युपकार की भावना के साथ दान करते हैं तो वह दान धर्म नहीं बनता : आचार्य भव्यदर्शन सुरीश्वर

AHINSA KRANTI NEWS
मैसूरु : 20 जुलाई 2020 सुमतिनाथ जैन श्वेतांबर मूर्ति पूजक संघ के तत्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास कर रहे आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर ने कहा कि प्रबंध चिंतामणि ग्रंथ में कहा गया है कि सूर्यअस्त होने तक याचको को धन का दान अगर नहीं किया तो सुबह वह धन किसका होगा ? उसका पता मुझे नहीं है l सही अर्थ में देखें तो भिक्षुक लोग याचना नहीं करते l लेकिन मानवों को बोध देता है l आप कुछ भी दान करो…. नहीं करने वाले की हालत हमारे जैसी होती है l दान देने वालों के लिए विवेकविलास ग्रंथ में लिखा है कि अगर आप माया करके, अहंकार से, शर्म से या प्रत्युपकार की भावना के साथ दान करते हैं तो वह दान धर्म नहीं बनता l
भगवद गीता में भी लिखा है कि “देना चाहिए” इस विचार के साथ, उपकार नहीं करने वाले पात्र को, योग्य काल और योग्य देश क्षेत्र में देते हैं वही सात्विक दान कहलाता है l ऐसा पंडितों का कहना है l दान देना ही चाहिए परंतु लेने वाले पात्र के बारे में भी सोचना जरूरी है l अपात्र के हाथों में दान नहीं देना चाहिए l अपात्र को दान देने से लाभ की बजाय नुकसान होता है l देने वाला मानव दरिद्र कुल में जन्म लेता है l दरिद्रता के कारण वहां पाप करता है l पाप के प्रभाव से उसको नरक में जाना पड़ता है l वहां से निकलने के बाद भी वापस दरिद्र ही होता है l ऐसा गरुड़ पुराण में लिखा है l जबकि सिंदूरप्रकर ग्रंथ की माने तो सुपात्र में दान देने से सच्चारित्री बनता है l
विनायक को बढ़ावा देता है l ज्ञान को उन्नत बनाता है l समता भाव को पुष्ट करता है l तप को बलवान बनाता है l पुण्यबंध होता है l उन सब के प्रभाव से स्वर्ग की और आत्मा जाती है l फ़ल स्वरूप मुक्ति भी मिलती है l जैन शास्त्रों में अनेक जगह पर लिखा है धर्मस्य आदि पद दानम, मतलब धर्म का पहला सोपान दान है l सुपात्र में दिया दान, स्वातिनक्षत्र में सीप में गिरा बारिश का बूंद मोती बन जाता है l दान से वर्तमान जन्म की बात करें तो भोग की प्राप्ति होती है l यश और कीर्ति दिगंत में फैलती है l सुख मिलता है l दान से, पुण्य से मिल गई संपत्ति वगैरह की सफलता होती है l

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